नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के हक में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए बच्चा गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) के नियमों में क्रांतिकारी बदलाव किया है। अदालत ने उस कानूनी प्रावधान को रद्द कर दिया है, जो केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही 12 हफ्ते की छुट्टी की अनुमति देता था। अब बच्चा चाहे किसी भी उम्र का हो, गोद लेने वाली मां को भी जैविक मां की तरह ही छुट्टियां मिलेंगी।
क्या था भेदभावपूर्ण नियम?
मातृत्व लाभ अधिनियम (Maternity Benefit Act) की धारा 5(4) के तहत अब तक यह नियम था कि यदि कोई महिला 3 महीने से छोटे बच्चे को गोद लेती है, तभी उसे 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलेगी। यदि बच्चा 3 महीने से एक दिन भी बड़ा होता, तो मां को इस कानूनी छुट्टी का लाभ नहीं मिलता था।
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस पंकज मिथल की बेंच ने इस नियम को ‘मनमाना’ और ‘भेदभावपूर्ण’ करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि एक मां और बच्चे के बीच का रिश्ता उम्र पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उनके बीच के भावनात्मक जुड़ाव (Bonding) पर निर्भर करता है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश केवल शारीरिक रिकवरी के लिए नहीं, बल्कि बच्चे की देखभाल और मां-बच्चे के बीच संबंध मजबूत करने के लिए होता है।
समानता का अधिकार: कोर्ट ने कहा कि जैविक मां और गोद लेने वाली मां के बीच भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
बच्चे का हित: अदालत ने तर्क दिया कि बड़े बच्चे को गोद लेने पर उसे नए माहौल में ढलने के लिए मां के साथ की और भी ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे में छुट्टी न देना बच्चे के विकास के साथ खिलवाड़ है।
कामकाजी महिलाओं पर क्या होगा असर?
LiveLaw की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस फैसले के बाद अब निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी।
उम्र का बंधन खत्म: अब 1 साल, 2 साल या उससे बड़े बच्चे को गोद लेने पर भी मां कानूनी तौर पर छुट्टी की हकदार होगी।
प्रोत्साहन: जानकारों का मानना है कि इस फैसले से उन परिवारों को प्रोत्साहन मिलेगा जो अनाथ या बड़े बच्चों को गोद लेना चाहते हैं, लेकिन ऑफिस की छुट्टियों की वजह से हिचकिचाते थे।
विशेषज्ञों की राय
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह आदेश न केवल महिलाओं के करियर को सुरक्षा देता है, बल्कि “गोद लेने” (Adoption) की प्रक्रिया को समाज में और अधिक स्वीकार्य बनाता है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि यह कानून का उद्देश्य ‘सामाजिक न्याय’ सुनिश्चित करना है, न कि केवल कागजी औपचारिकता पूरी करना।

