Sri Lanka Crisis: श्रीलंका के अंदरूनी हालात खराब, देश में भड़क सकता है जनविरोध

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कोलंबो। श्रीलंका में अंदरूनी राजनीति को संभालने में राष्ट्रपति विक्रमसिंघे की सरकार के सामने अब चुनौतियां बढ़ रही हैँ। विक्रमसिंघे सरकार विदेशी कर्जदाताओं को संदेश देना चाहती है कि वित्तीय नीतियों पर देश में आम सहमति बनी है और सारी राजनीतिक ताकतें इस विपत्ति में सरकार के साथ हैं। लेकिन मामला इसके बिल्कुल उलट है। देश के भीतर बुनियादी मसलों पर मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे मतभेदों को अब नेता खुल कर जता रहे हैं। विपक्ष के सांसद हर्षा डि सिल्वा ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष श्रीलंका सरकार के करार कॉपी को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है। समझा जाता है इस समझौते में विक्रमसिंघे सरकार ऐसे कदम उठाने पर सहमत है। जिनकी तगड़ी आर्थिक मार आम लोगों पर पड़ेगी। आशंका जताई है कि अगर समझौते का ब्योरा सामने आया, तो कर्ज मिलने से पहले देश में जन विरोध भड़क सकता है।

हर्षा डि सिल्वा ने मांग की है कि समझौता कॉपी को संसद में पेश किया जाए। डि सिल्वा संसद की सार्वजनिक वित्त समिति के अध्यक्ष हैं। माना जा रहा है कि उनकी इस मांग को नजरअंदाज करना सरकार के लिए काफी मुश्किल होगा। बताया जाता है कि आईएमएफ के साथ कर्मचारी स्तर पर समझौते श्रीलंका सरकार के राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के चार प्रतिशत से कम करके 2024 तक 2.3 प्रतिशत पर लाने के लिए राजी हुई है। हर्षा डि सिल्वा ने ने कहा कि इस लक्ष्य को देखते हुए सरकार को नए टैक्स लगाने होंगे। ये टैक्स या लाभांश पर लगेगा या फिर परोक्ष कर के रूप में लागू होगा। सरकार से गुजारिश है कि वह समझौते की कॉपी संसद में पेश करें। डि सिल्वा ने ध्यान दिलाया है कि अतीत में जब आईएमएफ के साथ करार हुआ है तो सार्वजनिक किया गया था।

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