अमित बिश्नोई
हमारे देश का संविधान और इसकी भाषा कुछ ऐसी है कि इसे समझने के लिए आपको कम से कम लॉ की पढ़ाई तो करनी ही होगी. हालांकि, एक 22 साल के युवा ने इसे लोगों तक आम भाषा में पहुंचाने का बीड़ा उठाया है. लॉ स्टूडेंट स्वप्निल त्रिपाठी ब्लॉग के जरिए न सिर्फ संविधान की मुश्किल लैैंग्वेज को आसान शब्दों में लोगों तक पहुंचा रहे हैैं, बल्कि केशवानंद भारती वर्सेज केरल सरकार जैसे कई फेमस केसेज को भी आसान शब्दों में लोगों को समझाने का प्रयास कर रहे हैैं. कानपुर से ताल्लुक रखने वाले स्वप्निल ने जोधपुर लॉ यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है और आगे की पढ़ाई के लिए वह अब ऑक्सफोर्ड जा रहे हैैं.
मिली इंटरनेशनल पहचान
स्वप्निल ने पिछले दो साल से यह ब्लॉग लिखना शुरू किया है, जिसका नाम है द बेसिक स्ट्रक्चर. उनके मुताबिक, इसके जरिए मैैं संविधान की मूल भावना और इसके बेसिक्स को लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं ताकि एक आम इंसान समझ सके कि हमारा कानून क्या बोलता है. कांस्टीट्यूशनल ब्लॉग्स को रैैंकिंग देने वाली इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फीडस्पॉट्स ने इस ब्लॉग को 21वीं रैैंक दी है. उसने इस ब्लॉग को सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले ब्लॉग्स में शामिल किया हैै. उनकी रैैंकिंग्स में हॉवर्ड लॉ रिव्यू, ऑक्सफोर्ड का पर्सनल ब्लॉग, इंडिया का लीफ लेट जैसे बेहद पढ़े जाने वाले ब्लॉग्स भी शामिल हैैं.
पढऩे के शौक ने सिखाया लिखना
स्वप्निल को ब्लॉग लिखने की आदत उनके पढऩे के शौक की वजह से लगी. उनके मुताबिक, उन्हें लॉ और हिस्ट्री पढऩे का काफी शौक है. वह खाली समय में सुप्रीम कोर्ट के पुराने केसेज की स्टडी करते हैैं. तभी उन्हें लगा कि इन केसेज को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाया जाए और इसी वजह से उन्होंने ब्लॉग लिखना शुरू किया.
घर बैठे देख सकते हैैं सुप्रीम कोर्ट की लाइव प्रोसीडिंग्स
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की बेंच ने दो साल पहले एक बेहद अहम फैसला सुनाया था, जिसमें कोर्ट की प्रोसीडिंग्स की लाइव स्ट्रीमिंग की इजाजत दी गई थी. यह फैसला स्वप्निल की ही पीआईएल पर हुआ था.
इस बारे में स्वप्निल बताते हैैं कि लॉ स्टूडेंट होने के नाते मैैं कोर्ट की प्रोसीडिंग्स को देखना चाहता था, लेकिन मुझे सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में एंट्री ही नहीं मिली.
मुझे लगा कि ये गलत प्रैक्टिस है, क्योंकि अगर हम जाकर देखेंगे नहीं कि आर्गुमेंट्स कैसे होते हैैं तो हम सीखेंगे कैसे. ये तो राइट टू लर्निंग का भी वायलेशन है.
इसे मैैंने पीआईएल के जरिए चैलेंज किया. मेरी इस पीआईएल पर 9 महीने बाद कोर्ट ने लाइव स्ट्रीमिंग की इजाजत दे दी.
इसका मतलब ये कि भारत का कोई भी नागरिक सुप्रीम कोर्ट में चल रहे किसी भी प्रोसीडिंग्स को अब घर बैठे देख सकता है.
कोर्ट ने की तारीफ
जिस बेंच में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाय चंद्रचूण भी थे. इसी तरह की पीआईएल सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह और कुछ अन्य लोगों व एनजीओस ने भी दायर की थी, लेकिन इसे क्लब करने के बावजूद इसका नाम स्वप्निल त्रिपाठी वर्सेज सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया पड़ा. यही नहीं, जस्टिस डी वाय चंद्रचूण ने अपने फैसले के लास्ट पैरा में लिखा कि मैैं इस तरह के केस को सुप्रीम कोर्ट के सामने लाने के लिए लॉ स्टूडेंट स्वप्निल त्रिपाठी का शुक्रिया अदा करता हूं.
आप भी ला सकते हैैं बदलाव
ऑक्सफोर्ड से लौटकर भी स्वप्निल अपने शहर और राज्य के लिए कुछ करना चाहते हैैं. उनका मानना है कि हमारे शहरों में ऐसी कई समस्याएं हैैं, जिन्हें सही प्लेटफॉर्म पर उठाना बेहद जरूरी है. वो बताते हैैं कि कुछ साल पहले दिल्ली से लौटने के बाद मैैंने एक रोड पर काफी कचरा देखा. मैैंने सीएम योगी को एक लेटर लिखकर इस बारे में अवगत कराया. एक महीने में नगर निगम ने न सिर्फ वहां कचरा साफ किया, बल्कि मुझे अवगत भी कराया. ये बताता है कि अगर आप कानून जानते हैैं तो बदलाव ला सकते हैैं.

