जो जीता उसे सिकंदर कहते हैं, जीत के जश्न में कमियों का ढक जाना एक आम बात है और फिर जब जीत पाकिस्तान के खिलाफ मिली हो तो कमियां निकाल कर रंग में भंग डालने की कोशिश क्यों? बात सही है लेकिन सिर्फ उनके लिए जो इस मैच को सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित रखते हैं, एक विश्लेषक के तौर पर हम इससे थोड़ा अलग देख रहे हैं. हम इसे सिर्फ एशिया कप तक ही सीमित नहीं कर रहे हैं हम इसे अक्टूबर में होने वाले टी 20 विश्व कप तक देख रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि हमारे गेंदबाज़ों ने बुमराह और हर्षल के बिना पाकिस्तान के खिलाफ बहुत शानदार प्रदर्शन किया मगर उसके बाद बल्लेबाज़ी के दौरान हमें जैसा दिखना चाहिए था शायद हम वैसा नहीं दिखे।
एक ऐसा मैच जिसे हमें बड़ी आसानी से जीतना चाहिए था उसे हम अंतिम ओवर की चौथी गेंद तक लेकर गए. अब इसके लिए दो ही बातें कही जा सकती हैं कि या तो हमने अच्छी बल्लेबाज़ी नहीं की या फिर पाकिस्तान की गेंदबाज़ी शानदार रही. आप पाकिस्तान की गेंदबाज़ी पर नज़र डालेंगे तो वह बिलकुल ही अनुभवहीन थी, शादाब खान के अलावा किसी के पास भी तजुर्बा नहीं था. उसपर से नसीम शाह आखिर के ओवरों में क्रैम्प के कारण लड़खड़ा रहे थे. पाकिस्तान की टीम में ऐसा कौन सा गेंदबाज़ था जिसने भारतीय बल्लेबाज़ों को परेशान किया। टी-20 में डेब्यू करने वाले नसीम शाह ने ज़रूर लड़खड़ाने से पहले भारतीय बल्लेबाज़ों का कड़ा इम्तेहान लिया, उनके अलावा बाकी गेंदबाज़ औसत ही नज़र आये. मोहम्मद नवाज़ को तीन विकेट मिले मगर मैच देखने वाले जानते हैं कि उन्होंने विकेट लिए नहीं बल्कि उन्हें दिए गए.
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रोहित शर्मा और विराट कोहली जिस तरह की लापरवाई भरा शॉट खेलकर आउट हुए ऐसी उम्मीद उन से नहीं की जा सकती। मैं सुन रहा था कमेंटेटर आकाश चोपड़ा उन्हें दिल और धड़कन बता रहे थे मगर उनकी लापरवाई चोपड़ा की इन उपमाओं से मेल नहीं खाती। मानते हैं कि विराट कोहली इन दिनों मानसिक दबाव में हैं, उन्होंने खुद इस बात को स्वीकारा है लेकिन थोड़ा लड़खड़ाने के बाद वह अपनी लय में आते दिख रहे थे, उनके बल्ले पर गेंदें अच्छी तरह से लग रही थीं, उनके पास एक बड़ी पारी खेलकर अपना आत्मविश्वास पाने का सुनहरा मौका था लेकिन जिस कमज़ोर तरीके से वह आउट हुए उससे तो यही लगा कि मानसिक दबाव उनपर अभी भी हावी है. यही बात रोहित शर्मा के लिए भी कही जाएगी। उन्होंने भी बड़ी गैरज़िम्मेदारी का सबूत दिया। वह जिस शॉट पर आउट हुए उसे कतई सही नहीं कहा जा सकता। इसके बाद उनका सूर्यकुमार की जगह रविंद्र जडेजा को नंबर चार पर भेजना लोगों की समझ में बिलकुल नहीं आया, यह अलग बात है कि जडेजा का प्रयोग काम कर गया लेकिन शायद यह प्रयोग वाला मैच नहीं था और ज़रुरत भी नहीं थी. पोस्ट मैच प्रेस कांफ्रेंस में रोहित का यह कहना कि इस तरह से मैच जीतना ज़्यादा अच्छा होता है. हो सकता है यह उनका कोई नया लॉजिक हो लेकिन उनका यह प्रयोग अगर नाकाम हो गया होता तो रोहित शर्मा से जवाब देते न बनता।
जवाब तो खैर उनसे अब भी मांगे जा सकते हैं कि मैच को उन्होंने उस सिचुएशन तक जाने ही क्यों दिया कि पाकिस्तान को भी अपनी संभावनाएं नज़र आने लगी थीं. मैच से एक दिन पहले रोहित शर्मा ने कहा था कि हम प्रयोग करने से नहीं डरेंगे। जहाँ तक प्रयोग की बात है तो टीम इंडिया पिछले एक साल से लगातार प्रयोग कर रही है , बहुत से कॉम्बिनेशन को ट्राई किया है, कामयाबी भी हासिल की है, एक मज़बूत बेंच स्ट्रेंथ भी तैयार हो गयी है जो मेन खिलाडियों को रिप्लेस करने के लिए तैयार भी बैठी है, जितने भी नए खिलाडियों को मौका मिला है वह लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन अब सेटेलमेंट का समय आ गया है, अब ज़्यादा प्रयोग बंद होने चाहिए, टी 20 विश्व कप में अब ज़्यादा समय नहीं बचा है. यहाँ मैं एकबात का ज़िक्र करना ज़रूरी समझता हूँ. इस अहम् मैच में दोनों टीमों के कप्तानों ने एक ही जैसी गलती की जो बहुत बड़ी गलती थी और एक कप्तान को इससे बचने का तरीका आना चाहिए। दरअसल नए नियमों के मुताबिक अगर टीम निर्धारित समय से ज़्यादा समय अपने ओवरों को पूरा करने में लेती है तो जितने भी ओवर बचते हैं उनमें उससे पेनाल्टी स्वरुप सर्किल से बाहर फील्डर रखने का एडवांटेज एक तरह छीन जाता है. अंतिम पावर प्ले में जब आप सर्किल के अंदर चार फील्डरों के साथ खेलते हैं तो पेनल्टी की वजह से आपको एक फील्डर और अंदर रखना पड़ता है जो स्लॉग ओवर्स में किसी भी टीम को बहुत भारी पड़ सकता है. हैरानी तो इस बात की रही कि रोहित की गलती से बाबर ने भी सबक नहीं सीखा और वही गलती दोहराई, इतने बड़े लेवल पर कप्तान को ऐसे गलतियों से हमेशा बचना चाहिए और इससे आसानी से बचा जा सकता है. आज सिर्फ इतना ही, फिर आपके पास जल्द आऊँगा, अभी तो एशिया कप में पाकिस्तान से कम से कम एक मुकाबला और भी खेलना है.

