आज की सच्चाई, आजमगढ़, रामपुर में ढह चूका है सपा का किला

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अमित बिश्‍नोई

रामपुर में चुनाव हारने की खबर पर अभी समाजवादी पार्टी प्रतिक्रिया भी नहीं आई थी कि आजमगढ़ से भी बुरी खबर आ गयी. यहाँ से पिछले चुनावों में अखिलेश यादव से हारने वाले भोजपुरी सिने स्टार दिनेश लाल निरहुआ ने अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव को पटकनी देकर सपा को उनके गढ़ में पटकनी दी. लेकिन इस हार के पीछे अगर देखा जाय तो निरहुआ को जीत बसपा उम्मीदवार गुड्डू जमाली की वजह से मिली है. पिछले विधानसभा चुनाव में मुबारकपुर से बुरी तरह हारने वाले शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली को 29. 27 प्रतिशत यानि 266106 वोट प्राप्त हुए जो सपा की हार का बड़ा कारण बने. 

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चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार आज़मगढ़ में भाजपा के दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ को 312432 वोट, सपा के धर्मेंद्र यादव को 303837 वोट प्राप्त  हुए. अगर 2019 के आंकड़ों को देखे तो यहाँ पर अखिलेश यादव को 6,21,578 का ज़ोरदार मत प्राप्त हुआ था जो 60 प्रतिशत से भी अधिक था वहीँ दिनेश लाल यादव निरहुआ को 3,61,704 वोट मिले थे और उन्हें लाखों के मार्जिन से हार मिली थी लेकिन इसबार गुड्डू जमाली उनके लिए एक मददगार बनकर आये और उन्हें जीत दिला दी. गुड्डू जमाली को मिले इतने वोटों से एक बात साबित हो गयी कि मुसलमानों की अखिलेश से नाराज़गी की जो बात कही जा रही थी वह सच साबित हुई, इसके अलावा बसपा का कोर वोटर भी फिर से अपनी पैटर्न पार्टी की तरफ लौटा है. मायावती ने इस चुनाव को लेकर दलित और मुस्लिम का जो दांव खेला था वह काफी हद तक कारगर साबित हुआ. 

नतीजों को देखने के बाद कहा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी को मुसलमानों की नाराज़गी भारी पड़ी है. वहीँ अगर बसपा इस चुनाव में संगठनात्मक तौर पर कुछ और गंभीरता से लड़ती तो परिणाम उसके हक़ में भी जा सकते थे, निरहुआ और जमाली के मतों में लोकसभा चुनाव को देखते हुए कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है. इतने मतों के अंतर को थोड़ी सी मेहनत से बढ़ाया जा सकता था।  वैसे गुड्डू जमाली ने चुनाव में काफी मेहनत की. विधानसभा चुनावों में जिस मुसलमान ने उनसे दूरी बनाये रखी उसी मुसलमान ने उनके सम्मान को बचाया भी, हार ज़रूर मिली लेकिन ऐसी हार से किसी को भी ज़्यादा मलाल नहीं होता। 

रामपुर कहिये या आजमगढ़ दोनों ही समाजवादी पार्टी के गढ़ माने जाते हैं और अभी विधानसभा चुनावों में यह दिखा भी है, आज़म गढ़ की जहाँ सभी विधान सभा सीटों पर सपा का परचम लहराया था, कोई सोच भी नहीं सकता था कि चंद महीनों बाद बाज़ी ऐसे पलटेगी। रामपुर के उम्मीदवार को अगर हम तुलनात्मक रूप से कमज़ोर भी मान लें लेकिन आजमगढ़ के बारे में ऐसा नहीं था, यहाँ तो उनके भाई मैदान में थे , तमाम नामों पर विचार के बाद परिवार के ही व्यक्ति को उम्मीदवारी मिली थी, और परिवार के व्यक्ति को उसी सीट से उतारा जाता है जो सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है. याद होगा कि पहले इस सीट से अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव का नाम पक्का समझा जा रहा था, बाद में और नाम भी आये थे. धर्मेंद्र यादव पर तो दांव इस लिए लगाया गया था कि एक तो घर के व्यक्ति थे उनके साथ मुलायम सिंह यादव का भी नाम जुड़ा था दूसरे  वो दो बार सांसद भी रह चुके थे. 

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अब इन दोनों सीटों पर कॉन्फिडेंस का आलम यूँ समझिये कि अखिलेश यादव ने यहाँ जाकर चुनाव प्रचार करना भी ज़रूरी नहीं समझा। अब जबकि बाज़ी ख़त्म हो चुकी है, मात मिल चुकी है तो हारे हुए शातिर की तरह  बिसात में हेर फेर की बातें कही जा रही हैं. वो सारी बातें जो एक हारने वाली पार्टी और हारने वाला उम्मीदवार करता है. हो सकता है उनकी बातों में, उनके आरोपों में कुछ दम हो, सच्चाई भी हो मगर आज के चुनाव में इस तरह के फैक्टर्स को लेकर ही चुनाव में उतरा जाता है, कम से कम विपक्षी पार्टियों को और उन पार्टियों को जो पहले सत्ता का सुख भोग चुकी होती हैं. उन्हें ढंग से मालूम होता है कि यह सब चुनावों में आम बात होती जा रही है. रामपुर और आजमगढ़ में सपा का किला ढह चूका है और आज की सच्चाई यही है.

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