देहरादून। दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में हुई हिंसा के आरोपियों से मिली जानकारी के अनुसार वे बांग्लादेश से दशकों पहले आकर यहां पर रह रहे हैं। देश की राजधानी जहांगीरपुरी का इलाका रोहिंग्या से भरा हुआ है। वोटों की सरपरस्ती में इन लोगों को राजनैतिक दलों ने पाला जो कि आज देश के लिए ही नासुर बन गए हैं। इससे आज देश का कोई राज्य अछूता नहीं है।
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उत्तराखंड में भी रोहिंग्या की एक बड़ी आबादी यहां का हिस्सा बन चुकी है। ये रोहिंग्या बांग्लादेश से नेपाल के रास्ते उत्तराखंड में दाखिल हुए और उसके बाद इन्होंने अपने सुरक्षित ठिकाने बना लिए। चंद रुपयों के लालच में आकर दलालों ने इनको उत्तराखंड में वो सब कुछ उपलब्ध करा दिया जो कि इस देश और उत्तराखंड की नागरिकता के लिए चाहिए होता है। रोहिंग्या की एक बड़ी आबादी इस समय हल्द्वानी के अलावा ऊधम सिंह नगर और कुमाऊं मंडल में निवास कर रही है। ये लोग स्थानीय विशेष समुदाय में ऐसे घुलमिल गए हैं कि इनको अब पहचान पाना मुश्किल है। जिससे अब ये उत्तराखंड के साथ ही देश की सुरक्षा और संप्रभुता के खतरा बन गए हैं।
खुफिया जांच एजेंसियों ने इनके उत्तराखंड पहुंचना बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है। इनको देश के भीतर भेजने के लिए बाहरी ताकतों ने बांग्लादेश से बिहार, उप्र और उत्तराखंड तक एक कारिडोर तैयार किया। इसके बाद ये प्रवेश करते गए। उत्तराखंड से लगे उप्र के कई जिले जो कि अतिसंवेदनशील हैं वहां से पहाड़ में रहने वाले रोहिंग्य को आज भी सहायता मिल रही है।
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ऐसे करते हैं घुसपैठ
खुफिया एजेंसियों की माने तो बांग्लादेश से देश में घुसपैठ के बाद रोहिंग्या का पहला पड़ाव वाराणसी और गोरखपुर होता है। वहां से ये लखनऊ, कानपुर होते हुए दिल्ली, गाजियाबाद और एनसीआर के जिलों में बंट जाते हैं। इसके अलावा कुछ रोहिंग्या घुसपैठिए लखनऊ,शाहजहांपुर,फरदीपुर,बरेली से होते हुए उत्तराखंड में प्रवेश कर जाते हैं। उत्तराखंड में प्रवेश करने के बाद ये हल्द्वानी,ऊधम सिंह नगर, नैनीताल, बागेश्वर,अल्मोड़ा, चम्पावत और पिथौरागढ़ में फैल जाते हैं। वर्ष 2012 से रोहिंग्य की संख्या देश में लगातार बढ़ती जा रही है।

