रमजान रोजेकुशाई

लाइफस्टाइलरमजान रोजेकुशाई

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Zeba Hasan

हैदर अली की दादी को देर सुबह पता चला कि उनके पोते ने आज पहला रोजा रखा है। जैसे ही दादी को पता चला उन्होंने पांच सौ रुपए निकाल कर हैदर को थमाते हुए कहा, बेटा यह तोहफा है तुम्हारे पहले रोजे रखने की खुशी का। दरअसल रमजान में जब कोई बच्चा अपना पहला रोजा रखता है वह दिन घर के बड़े, बुजुर्गों के लिए भी बहुत खास होता है। बच्चे के पहले रोजे को बहुत ही धूम के साथ रखवाया जाता है, शाम को बड़ी दावत होती हैं, बच्चे को घर के लोगों के साथ आने वाले मेहमान तोहफे देते हैं और इस रस्म को रोजा-कुशाई कहा जाता है। रोजेकुशाई के बाद बच्चे हर साल रोजा रखने के पाबंद हो जाते हैं। बचपन में होने वाली यह रस्म की यादें हमेशा जेहन में ताजा रहती हैं।

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अम्मी ने दिनभर दिया था पहरा

लखनऊ हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे एजाज हसन अपने पहले रोजे के बारे में बताते हैं कि उस वक्त शायद मैं 12 साल का था जब मुझे रोजा रखने का शौक चढ़ा था। मैं खाने का शौकीन था और भूख भी बहुत लगती थी। यही वजह है कि जिस दिन मैंने रोजा रखा मेरी अम्मी दिनभर मुझ पर नजर रखे हुई थीं। उन्हें लगता था कि कहीं मैं कुछ खा ना लूं। शानदार दावत हुई लेकिन मैंने अपना पहला रोजा पूरा किया। शाम को घर में पूरा खानदान जमा था। मुझे शेरवानी पहनाई गई थी, फूलों का हार गले में डाला गया था। जो भी आ रहा था मेरे लिए तोहफे ला रहा था। जब भी रमजान आता है, बच्चों को रोजा रखते हुए देखता हूं तो अपनी रोजेकुशाई का दिन याद आता है। 

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जब चुप्पे से रख लिया था रोजा

शीशमहल के नवाब मसूद अब्दुल्ला ने बहुत छोटी उम्र में चुप्पे से रोजा रख लिया था। जब दोपहर हुई उनसे घरवालों ने खाना खाने के लिए कहा तो उन्होंने खाने से मना करते हुए बताया कि उनका तो रोजा है। यह बात सुनते ही घरवालों ने फौरन एक शानदार दावत का इतजाम में लग गए थे। मसूद कहते हैं कि मुझे याद है मेरी नानी मुझे फौरन अपने रूम में लेकर गई और एक नया कपड़ा मेरे लिए निकाला। दर्जी बुलाकर उसे फौरन सिलने के लिए दिया गया, मेहमानों को दावतनामा भेज दिया गया, घर के सारे नौकर पकवान बनाने में लग गए। शाम को मुझे दूल्हा की तरह तैयार किया गया। फूलों के जेवर पहनाए गए, रोजा खुलने के बाद ढोल वाले आए ढोल बजी और मेहमानों ने खूब तोहफे दिए थे। बच्चों के लिए यह रस्म उन्हें खुश करने के साथ रोजे के लिए मोटीवेट करने के लिए भी की जाती रही है।

इस्लाम में 14 साल के लड़के और 9 साल की लड़की पर रोजा वाजिब हो जाता है। मां बाप की भी यही ख्वाहिश रहती है कि उनके बच्चे सही उम्र पर अपने रोजे शुरू कर दें। और बच्चे के पहले रोजे पर बड़ी-बड़ी दावतें भी दी जाती हैं। रोजा-कुशाई पर दावत करना, पार्टी करना इस्लाम का हिस्सा नहीं है लेकिन बच्चों की खुशी के लिए इस रस्म की शुरुआत हुई थी। मौलाना यासूब अब्बास, शिया धर्मगुरु

 

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