अमित बिश्नोई
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठम युवा नेता इन दिनों फिर देश से बाहर हैं, कहाँ गए हैं , क्यों गए हैं, किस लिए गए हैं यह किसी को नहीं मालूम। सिर्फ इतना मालूम है यह उनका संक्षिप्त विदेशी दौरा है. वैसे तो यह किसी के लिए भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि वह कहाँ गए होंगे और क्यों गए होंगे। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि वह देश के बाहर नए साल का स्वागत पान पराग से करने गए हैं।
Read Also : खामोश मायावती ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की टेंशन
वैसे तो हर किसी की निजी लाइफ होती है, वह कहीं भी जा सकता है, कभी भी जा सकता है. लेकिन बात जब नेताओं की होती है वह भी कांग्रेस की टॉप लीडरशिप राहुल गाँधी की तो मामला उतना निजी नहीं रहता जितना दूसरों के मामले में होता है. बात निजी दौरे की नहीं है, बात है दौरे की टाइमिंग की. बहुत बार ऐसा होता है कि आपके निजी कार्यक्रम से भी बढ़कर कुछ अन्य कार्यक्रम भी होते हैं और आपको अपने निजी कार्यक्रमों पर उनको तरजीह देनी होती है विशेषकर जब आप एक ऐसी पार्टी के नेता हों जिसकी पहचान ही आपसे और आपके परिवार से हो. ऐसे में जब पार्टी को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो और आप कहीं और हों तो सवाल उठना लाज़मी है।
सबको मालूम है कि पांच राज्यों में चुनावी सरगर्मियां ज़ोरों पर हैं। इनमें से कांग्रेस को पंजाब बचाना है, उत्तरखंड में वापसी करना है, उत्तर प्रदेश में अपना वजूद बरकरार रखना है और गोवा, मणिपुर में अपनी साख बचानी है।
Read Also : क्या ब्राह्मणों पर भाजपा का पेटेंट रहेगा बरकरार
एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक राहुल गाँधी ने 2015 से 2019 के बीच लगभग 250 विदेश यात्राएं कीं, कभी परिवार के साथ, कभी अकेले। सवाल राहुल गाँधी के विदेश दौरों का नहीं है, बल्कि इन दौरों की टाइमिंग का है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि महत्पूर्ण समय पर राहुल देश से बाहर हों, इससे पूर्व अनगिनत मौकों पर वह भारत से नदारत थे और पार्टी को उनकी बहुत ज़रुरत थी, कई बार तो इस मामले में गठबंधन वाली पार्टियों को भी उनकी पलायनवादिता का खामियाज़ा भुगतना पड़ा और बाद में कहीं न कहीं गठबंधन टूटने की वजह भी बना।
आपको 2018 की बात याद दिलाते हैं, कर्नाटक में चुनाव हुए थे और चुनाव बाद कांग्रेस और जेडीएस के बीच मिलकर सरकार बनाने के लिए गठबंधन हुआ था, उस समय पोर्टफोलियो बांटने में इस लिए देरी हुई थी वह सोनिया गाँधी के साथ इटली चले गए थे. ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में गठबंधन के समय हुआ. देश में जब CAA कानून के खिलाफ ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन हो रहा था, कांग्रेस भी नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ मुखर थी मगर कांग्रेस के वरिष्ठम युवा नेता देश से बाहर थे।
ऐसा नहीं है कि राहुल गाँधी के देश में न होने की वजह देश की राजनीति थम जाती हो, राजनीति लगातार जारी रहती है. पार्टी भी काम करती रहती है लेकिन कुछ अहम् मौकों पर जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने का मौका होता है और निर्णय लेने वाला नदारद होता है, प्रॉब्लम तब आती है. उस समय पार्टी बड़ी दुविधा में होती है कि क्या करे. राहुल गाँधी भले ही पार्टी अध्यक्ष न हों लेकिन कांग्रेस पार्टी में अंतिम निर्णय उन्हीं का होता है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
कांग्रेस पार्टी के लिए इतने अहम् मौके पर राहुल गाँधी एक बार फिर राहे फ़रार अख्तियार किये हुए हैं. उनका यह छोटा सा निजी ट्रिप बड़ा भी बन सकता है, ओमीक्रॉन की दहशत पूरी दुनिया में है, कोरोना के रेकॉर्डतोड़ मामले दर्ज हो रहे हैं, अगर वह अपनी नानी के साथ नया साल मनाने गए हैं तो बता दें कि इटली जैसे छोटे देश में 30 दिसंबर को 126888 कोरोना के नए मामले आये हैं. राहुल का यह छोटा सा निजी ट्रिप कांग्रेस के बड़ा भी हो सकता है. खैर हमें क्या, यह कांग्रेस पार्टी और राहुल का निजी मामला है, लेकिन लोग तो बोलेंगे ही।

