अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लेकर प्रचार अपनी प्रचंडता पर है. कहीं नेताओं पर हमले हो रहे हैं (असली या बनावटी, यह बाद में पता चलेगा), कोई किसी की गर्मी निकालने की धमकी दे रहा तो कोई किसी की चर्बी उतार देने की बात कर रहा है, अब यह सब बातें कौन कर रहा है, यह सब आप अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि आप से समझदार कोई नहीं. लेकिन ऐसे माहौल में कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और यूपी इंचार्ज प्रियंका गाँधी वाड्रा कुछ अलग तरह की राजनीति और अलग तरह का चुनाव प्रचार कर रही हैं. ऐसा चुनाव प्रचार जिसमें नफरत नहीं जुड़ाव है, जिसमें तोड़ना नहीं जोड़ना है, जिसमें सपना नहीं हकीकत है, जिसमें साम्प्रदायिकता नहीं वास्तविकता है और वास्तविकता यह है कि इंसान को जीने के लिए रोटी कपड़ा और मकान चाहिए जिसका राजनीतिक पार्टियों से दूर दूर तक वास्ता नहीं है, लेकिन प्रियंका वाड्रा जनता के बीच वही सब बातें कर रही हैं जिसे सियासी जमातें जनता को याद नहीं दिलाना चाहती हैं. या कह सकते हैं कि मतदाताओं के मन मस्तिष्क से यह मुद्दे मिटा देना चाहती हैं।
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प्रियंका गाँधी यूपी में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने में जुटी हैं लेकिन अपने तरीके से. जनता तक सीधे संवाद के ज़रिये उनकी मूलभूत समस्याओं को अपनी आवाज़ देकर। प्रियंका कहती हैं कि चुनाव में कोई गर्मी उतारने की बात कर रहा है, कोई चर्बी उतारने की बात कर रहा मगर हम भर्ती निकालने मतलब रोज़गार की बातें कर रहे हैं क्योंकि लाखों, करोड़ों की तादाद में नौजवान बेरोज़गार है और कोई भी दल उनकी बात ही नहीं कर रहा है. प्रियंका लोगों से सवाल भी करती हैं और अनुरोध भी कि वह नेताओं से, प्रत्याशियों अपने जीवन से जुड़े मुद्दों पर सवाल करें। प्रियंका लोगों से अपील करती हैं कि गर्मी निकालने और चर्बी उतारने की बातें करने वालों को ख़ारिज करें क्योंकि यह लोग बुनियादी मुद्दों से भागने की कोशिश में इस तरह की बातें करते हैं।
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प्रियंका लड़कियों के लड़ने यानि महिला सशक्तिकरण की बात कर रही हैं, महिलांए जो देश की आधी आबादी हैं उन्हें उनका सही अधिकार देने की बात कर रही हैं और अपने इस वादे को पूरा करने के लिए अपने स्तर से शुरुआत भी कर चुकी हैं, महिलाओं को चुनाव में 40 प्रतिशत भागीदारी देकर। उन्हें मालूम है कि मंज़िल मुश्किल है मगर नामुमकिन नहीं, शुरुआत कहीं से तो करनी ही पड़ेगी। और इस तरह के क्रांतिकारी फैसले कांग्रेस पार्टी हमेशा ही करती आई है. एक लम्बी फेहरिस्त है ऐसे फैसलों की, नाम गिनाने से कोई फायदा नहीं। इतना जान लीजिये कि कांग्रेस के शासनकाल में भाजपा जिन फैसलों और योजनाओं पर हायतौबा मचाती थी, सत्ता में आने के बाद उन्हीं सारी योजनाओं को उसने अपना हथियार बना लिया। उसने आधार को अपना आधार बना लिया, ऐसा आधार जिससे वह हर एक पर नज़र रख सके, खाने-पीने, आने-जाने, सोने-जागने; हर पल हर एक पर नज़र. खैर यह एक ऐसा विषय है जिसपर अलग से बहुत कुछ लिखा जा सकता है, इस पर फिर कभी लिखेंगे।
बहरहाल प्रियंका का प्रचार, प्रियंका अंदाज़ जनता को भा रहा है यह जनता को साफ़ दिख रहा है. कहते हैं जी दिखता है वह बिकता है पर राजनीति में ऐसा ही होगा यह कोई ज़रूरी नहीं। अब देखना है कि यूपी के सामाजिक ध्रूवीकरण और जातीय समीकरण के बीच प्रियंका की इस साफ़ सुथरी सोच वाली राजनीति का जनता कितना प्रतिफल देगी यह 10 मार्च को ही पता चलेगा, पर प्रियंका वाड्रा यूपी में जिस प्रकार की राजनीति का खाका खींच रही हैं, उनकी तरह मुझे भी यक़ीन है कि वह सुबह कभी तो आएगी क्योंकि दुनिया में देर है अंधेर नहीं, नीयत अगर साफ़ है तो मंज़िल मिल ही जाती है।

