अमित बिश्नोई
क्या से क्या हो गया, कल जो अपना था आज बेगाना हो गया. कांग्रेस ने प्रशांत किशोर के साथ मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के जो सपने संजोए थे, एक झटके में सब बिखर गए, भविष्य की राजनीती के लिए बनाया गया एम्पॉवर्ड ग्रुप पीके के एक इंकार से पॉवर्डलेस हो गया. पिछले एक महीने से ख़बरें चल रही थी पीके कांग्रेस में आ रहे हैं, पीके कांग्रेस की नैया पार लगाने जा रहे हैं, पीके यह पीके वह। सब एक झटके में ख़त्म। प्रशांत किशोर का कांग्रेस से यह दूसरा प्रेम प्रसंग भी शादी से पहले समाप्त हो गया।
कल तक यह बातें हो रहीं थी कि प्रशांत किशोर कभी भी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं लेकिन 24 घंटे के अंदर ही पहले रणदीप सुरजेवाला का ट्वीट और फिर प्रशांत किशोर के ट्वीट ने एक राजनीतिक धमाका कर दिया। इस फैसले से कांग्रेस पार्टी का एक बड़ा धड़ा जिसकी नुमाइंदगी वरिष्ठों की जमात कर रही थी बेहद खुश हुआ है, आप कह सकते हैं प्रशांत किशोर बुज़ुर्ग कांग्रेसियों का आशीर्वाद प्राप्त करने में नाकाम रहे. यह बुज़ुर्ग सोनिया गाँधी को यह समझाने में कामयाब रहे कि प्रशांत किशोर पर आँख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता, उन्हें बंधनों में बांधना ज़रूरी है और पीके को बंधन स्वीकार्य नहीं।
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प्रशांत किशोर के प्रेजेंटेशन के बाद जब सोनिया गाँधी ने कमेटी बनाकर प्रेजेंटेशन पर रिपोर्ट बनाने की ज़िम्मेद्दारी वरिष्ठ नेताओं को सौंपी, दरअसल इस रिश्ते के टूटने की बुनियाद वहीँ से पड़ गयी थी, प्रशांत किशोर ऐसा मानकर चल रहे थे उनके प्रेजेंटेशन पर सोनिया खुद सीधा फैसला लेंगी, उन्हें प्रियंका गाँधी का भी समर्थन प्राप्त था लेकिन राहुल गाँधी कहीं न कहीं पीके पर अन्य वरिष्ठ कांग्रेसियों की तरह श्योर नहीं थे. पीके के प्रेजेंटेशन पर रिपोर्ट देने वाली कमिटी के ज़्यादातर लोग भी पीके के समर्थन में नहीं थे, नतीजा यह हुआ कि भविष्य के चुनावी अभियानों के लिए इस रिपोर्ट के आधार पर एक एम्पॉवर्ड कमेटी बना दी गयी और तय हुआ कि प्रशांत किशोर को इस पावरफुल कमिटी का इंचार्ज बनाकर चुनाव की ज़िम्मेदारी सौंपी जाय. सोनिया गाँधी ने यह ऑफर पीके के सामने रखा जिसे पीके ने साफ़ तौर पर ठुकरा दिया, जैसा कि इसकी उम्मीद थी।
प्रशांत किशोर दरअसल कांग्रेस में आकर बड़ी पोजीशन तो चाहते थे मगर चुनाव हारने या जीतने वाली पोजीशन नहीं। अपने ट्वीट में प्रशांत किशोर ने कहा भी कि कांग्रेस पार्टी को जड़ों में समां गयी समस्याओं से उबारने के लिए मेरी नहीं बल्कि लीडरशिप की ज़रुरत है. पीके ने अपने ट्वीट में साफ़ तौर पर एक लीडर के तौर चुनाव की ज़िम्मेदारी निभाने से इंकार किया। प्रशांत किशोर के इस फैसले की भनक तो उसी दिन लग गयी थी जब सोनिया से मिलने दिल्ली गए गुजरात के पाटीदार लीडर नरेश पटेल बिना उनसे मिले वापस चले आये और उधर प्रशांत किशोर तेलंगाना में KCR के मेहमान बन गए, इसी बीच प्रशांत किशोर की कंपनी IPAC ने टीआरएस से अगले चुनाव के लिए एग्रीमेंट कर लिया। शायद यह एग्रीमेंट इस रिश्ते के टूटने की बड़ी वजह बना, हालाँकि शुरुआत तो पहले ही हो चुकी थी।
कांग्रेस पार्टी भी दरअसल यह नहीं चाहती थी कोई ऐसा व्यक्ति उनकी चुनावी मुहीम चलाये जो पहले ही अन्य राज्यों में दूसरी पार्टियों के लिए काम कर रहा हो. तार्किक रूप से बात सही भी है, इन परिस्थितियों में हितों का टकराव होना कोई बड़ी बात नहीं। तेलंगाना हो, आंध्र प्रदेश हो, तमिलनाडु हो या फिर बंगाल। इन सभी राज्यों में सेक्युलर विचारधारा की पार्टियां ही हैं, इन सभी राज्यों को कांग्रेस यूँ ही नहीं छोड़ सकती। प्रशांत किशोर न तो ममता से नाता तोड़ सकते थे और न ही KCR से . जगनरेड्डी भी उनके क्लाइंट हैं इसलिए लोकसभा चुनावों में कोई न कोई पार्टी समझौतों का शिकार होती ही और शिकार बनने में कांग्रेस पार्टी के चांसेस ही सबसे ज़्यादा थे । शायद यही सब बातें कांग्रेस और पीके के प्रेम में रूकावट बनीं।
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साहिर लुधियानवी का एक मशहूर गीत है “चलो एकबार फिरसे अजनबी बन जांय हम दोनों”, अब देखना यह कि क्या यह दोनों वाक़ई में पूरी तरह अजनबी बन गए हैं या फिर एक प्रोफेशनल के तौर पर प्रशांत किशोर गुजरात और हिमाचल के लिए कांग्रेस पार्टी को अपने सेवाएं देंगे और क्या कांग्रेस उनसे सेवाएं लेगी? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा। फिलहाल तो रिश्ता टूट चूका है और नेपथ्य में कहीं गाना बज रहा है “क्या से क्या हो गया, बेवफा।।। तेरे प्यार में।

