संभलिये महाराज! “कहीं देर न हो जाय’

आर्टिकल/इंटरव्यूसंभलिये महाराज! “कहीं देर न हो जाय’

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संभलिये महाराज! “कहीं देर न हो जाय’

ज़ीनत सिद्दीक़ी
अदालतें अक्सर सरकारों को फटकार लगाती हैं। यह एक प्रक्रिया है गलत रास्ते पर बढ़ रहे सत्ताधारियों को होश में लाने की, उन्हें बेलगाम होने से बचाने की पर मंगलवार 18 मई 2021 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जो टिप्पणी की वह एक ऐसी टिप्पणी थी जो किसी सरकार के गाल पर तमाचे से कम नहीं थी, साथ ही उस टिप्पणी में एक बेबसी, एक मजबूरी, एक व्यथा भी झलक रही थी. इस टिप्पणी में उच्च न्यायालय ने “राम भरोसे” जैसे मुहावरे का इस्तेमाल किया जो उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर था.

अदालत की यह टिप्पणी सख्त ज़रूर है मगर सटीक भी है, अदालत ने भले ही मामले की सुनवाई के दौरान मेरठ के सुभाष की चर्चा की मगर सम्मानित जजों की बेंच किसी एक सुभाष की बात नहीं कर रही थी, प्रदेश के सैकड़ों, हज़ारों सुभाष की बात कर रही थी. मेरा मानना है यह टिप्पणी किसी एक या दो घटनाओं को लेकर नहीं की गयी बल्कि बेंच के मन मस्तिष्क में पूरे प्रदेश के शमशानों में जलती हुई चिताएं, क़ब्रिस्तान में दफ़्न होते जनाज़े और नदियों में बहती हुई लाशें होंगी।

बात को हम ज़रा कुछ महीने पीछे ले जाएँ तो पाएंगे सब कुछ अच्छा चल रहा था, तीज त्यौहार, शादी ब्याह, शादियां, समारोह, मेले ठेले सब कुछ. देश प्रदेश से जैसे कोरोना ख़त्म हो चला था. सरकारें देश से लेकर विदेश तक वाहवाही लूट रही थीं, तभी समय चक्र बदला और शुरू हुआ तबाही का दौर, विधानसभा और पंचायत चुनाव कोढ़ में खाज साबित हुए. वाहवाही आलोचनाओं में बदलने लगी. कोरोना महामारी की दूसरी लहर विकराल रूप धारण करती चली गयी. कल तक विदेशों को मदद करने वाले देश ने उन्हीं से मदद लेनी शुरू कर दी. कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोरोना ने हर राज्य का हाल बेहाल कर दिया। यूपी भी इससे अछूता नहीं रहा. यहाँ हम बात सिर्फ यूपी की करेंगे जिसका सीधा सम्बन्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से है.

दरअसल अदालत की चिंता इसलिए भी गुस्से के रूप में ज़ाहिर हुई क्योंकि उसे शायद यह एहसास है कि यूपी के ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण ने पूरी तरह से पैर पसार लिए हैं. पंचायत चुनाव के बाद इस बात का अंदेशा पहले ही लगाया जा रहा था. यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि जब शहरी इलाकों में कोरोना से लड़ाई के लिए मूलभूत सेवाओं ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, बेड्स इत्यादि के लिए मारामारी चल रही है तो ग्रामीण इलाकों में कैसी हालत होगी। अभी तो हालत यह है कि कोरोना प्रभावित गांवों में सैनिटाइज़ेशन भी ढंग से नहीं हो रहा है. सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें पर गावों से रोज़ दर्जनों की तादाद में कोरोना जैसे लक्षणों से लोगों के मरने की ख़बरें मिल रही हैं. राजधानी लखनऊ के पास बख्शी का तालाब के एक गाँव में 20 दिनों में 15 लोगों की मौत हुई, एनसीआर से सटे गांव दुजावां में 19, शाहबनी में 21, जलालपुर में 23, बिसरख में 16 और सूरजपुर में 7 लोगों ने दम तोड़ा। इन सभी की मौत पिछले दो हफ़्तों में हुई। इसी तरह आगरा के पुरगांवा में 14 और बमरौली में 30 लोगों की मौत हुई, वहीँ बरेली के क्यारा में 26, गाज़ीपुर में 16, पीलीभीत में 24 मौतें। लिस्ट बहुत लम्बी है, संक्षेप में यह समझ लीजिये कि यही कहानी प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र की है, लेकिन सरकार इन्हें कोरोना से हुई मौतें नहीं मान रही है और माने भी कैसे और क्यों? क्योंकि जांच तो कोई हुई हुई नहीं! परिजनों ने अपने हिसाब से अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार कर दिया और सरकार की कोरोना मृतकों की टैली को और ऊपर जाने से बचा लिया।

खैर लिखने को बहुत कुछ है पर विषय पर रहते हुए कहने का यही मतलब है कि उच्च न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी को योगी सरकार किसी स्कूल मास्टर की डांट न समझे, क्योंकि अदालत की ऐसी टिप्पणियों का जनता में प्रभाव पड़ता है और जब ऐसी टिप्पणियां बार बार होने लगें तो प्रभाव और भी गहरा हो जाता है. राज्य में विधानसभा चुनाव ज़्यादा दूर नहीं हैं और सामने पीड़ित जनता है जिसके लिए अदालत ने ऐसी गंभीर टिप्पणी की है. तो समझने के साथ संभलिये महाराज वरना “कहीं देर न हो जाय’.

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