भारत की 21 वर्षीय पहलवान रितिका हुड्डा ने ओलंपिक में 76 किग्रा वर्ग के क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई। उन्होंने शीर्ष रैंक की किर्गिस्तान की पहलवान मेडेट कैजी के खिलाफ कड़ी टक्कर दी और मुकाबला बराबरी पर ला दिया, लेकिन नियमों ने उन्हें हारा हुआ घोषित कर दिया और उनका ओलंपिक पदक जीतने का सपना टूट गया।
क्वार्टर फाइनल में रितिका शुरू से ही अपनी प्रतिद्वंद्वी पर हावी रही। उन्होंने दूसरे मिनट में एक अंक बनाकर बढ़त बना ली, लेकिन शीर्ष वरीयता प्राप्त मेडेट कैजी ने कुछ ही देर में 1 अंक बनाकर इस बढ़त को बराबर कर दिया। आखिरकार मुकाबला 1-1 से बराबरी पर समाप्त हुआ और कैजी को विजेता घोषित किया गया।
दरअसल, मेडेट कैजी ने दूसरे राउंड में ‘पैसिविटी पॉइंट’ हासिल किया था। फ्रीस्टाइल कुश्ती में पहलवान को पैसिविटी पॉइंट तब दिया जाता है, जब प्रतिद्वंद्वी में आक्रामकता की कमी होती है या वह निष्क्रिय हो जाता है। इसमें प्रतिद्वंद्वी पहलवान को रेफरी से मौखिक चेतावनी मिलती है। इसके बावजूद अगर वह इसी रुख को बनाए रखता है तो 30 सेकंड का स्कोरिंग विंडो जारी किया जाता है। अगर इस समय में कोई पहलवान स्कोर नहीं कर पाता है तो निष्क्रिय पहलवान के प्रतिद्वंद्वी को एक तकनीकी अंक दिया जाता है। कैजी ने इसके तहत निष्क्रियता अंक हासिल किया था।
रितिका के मुकाबले में कैजी को इसका फायदा मिला, क्योंकि बाद के राउंड में रितिका अटैकिंग मोड में नहीं दिखीं। रितिका ने अपने खेल के दौरान कई बचाव किए, लेकिन ‘काउंटबैक नियम’ के कारण वह हार गईं। इस नियम के अनुसार, बराबरी की स्थिति में आखिरी अंक जीतने वाला पहलवान मुकाबला जीत जाता है। इसलिए मुकाबला 1-1 से बराबर होने के बावजूद रितिका मुकाबला हार गईं।
हालांकि, पदक की थोड़ी उम्मीद अभी भी बची हुई है। अगर पदक जीतने वाली कैजी इस इवेंट के फाइनल में पहुंच जाती हैं तो रितिका को रेपेचेज राउंड में जाने का मौका मिलेगा और उनके पास कांस्य पदक जीतने का मौका होगा। अब हम प्रार्थना करते हैं कि मेडेट कैजी फाइनल में पहुंचे और रितिका को एक और मौका मिले और भारत को सातवां पदक जीतने का अवसर मिले ताकि वह टोक्यो ओलंपिक के पदकों की बराबरी कर सके। भारत ने टोक्यो में सात पदक जीते थे।

