पंचायत चुनाव- सपा ने उड़ाई भाजपा की नींद

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पंचायत चुनाव- सपा ने उड़ाई भाजपा की नींद

-फरीद वारसी

पंचायत चुनाव- सपा ने उड़ाई भाजपा की नींद

अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पूर्व हो रहे जिला पंचायत चुनाव को 2022 का सेमीफाइनल कहा जा रहा था। जिला पंचायत चुनाव न सिर्फ प्रदेश की योगी सरकार के लिए, बल्कि सपा और बसपा के लिए काफी अहम माने जा रहे थे। गांवों की सरकार के लिए हो रहे इन चुनावों में कौन दल कितने पानी में है, जिला पंचायत चुनाव इसकी एक बानगी भर है। बंगाल में लगे झटके से भाजपा अभी उभर ही नहीं पाई थी कि उसे यूपी के पंचायत चुनाव में जोर का झटका लगा है। अभी तक आए चुनाव परिणामों पर एक सतही नज़र डाले तो यह स्पष्ट होता है कि भाजपा की जमीन जहां दरकी है, वहीं सपा एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है। उपचुनाव, स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव न लड़ने वाली बसपा भी इस बार मैदान में है और उसका प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करता है कि मायावती की राजनीतिक पारी का अभी अंत नहीं हुआ है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में खाली हाथ रहने वाली कांगे्रस को भी इन चुनावों में थोड़ी बहुत आक्सीजन हासिल हुई है। और निर्दलीयों ने तो खैर कमाल ही कर दिया है।

जहां तक प्रदेश की सत्तारूढ भाजपा की बात की जाए तो समूचे प्रदेश में पूर्वांचल से लेकर पश्चिम उत्तर प्रदेश तक भाजपा को झटके ही झटके लगे हैं। भाजपा की सबसे अधिक दुर्गति और शर्मनाक पराजय तो अयोध्या, काशी और मथुरा में हुई है। मालूम हो कि भाजपा की स्थापना से ही अयोध्या, काशी और मथुरा उसके एजेंडे में रहे हैं। जिसका राजनीति लाभ भाजपा प्रदेश औेर देश के दूसरे हिस्से में लेने से कभी संकोच नहीं करती है। ऐसे समय अयोध्या में भाजपा की हार जब वहां राम मंदिर निर्माण का काम हो रहा है और जिसका श्रेय लेने में भाजपा ने परहेज नहीं किया।

कहा जाता है कि अयोध्या के बाद भाजपा की रणनीति काशी और मथुरा के मुद्दे को धार देने की है ताकि अगले लोकसभा चुनाव तक देश को धार्मिक रूप ध्रुवीकरण करने का एक मुुद्दा उसके हाथ में रहे। पर, अयोध्या, काशी और मथुरा में भाजपा की हार कुछ और ही संकेत दे रही है। अयोध्या में 40 जिला पंचायत सीटों में सपा ने अकेले 24 सीटें जीत कर भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। भाजपा को यहां सिर्फ छह सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। काशी और प्रधानमंत्री मोदी के निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा को करारी हार से रूबरू होना पड़ा। जिला पंचायत की 40 में सीटों में से सपा ने 14 सीटें हासिल की। भाजपा को मात्र 8 और बसपा को 5 सीटें ही मिली। रहा सवाल मथुरा का तो यहां पर भी हार ने भाजपा का पीछा नहीं छोड़ा। यहां बसपा ने भाजपा को धूल चटाते हुए एक दर्जन सीटों पर जीत हासिल की। दूसरे नंबर पर चैधरी अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल रही जिसने 9 सीटें जीती और भाजपा के खाते में मात्र 8 सीटें ही आई।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि पश्चिम में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण किसानों की नाराजगी रही। जिसका अब भाजपा से मोहभंग हो चुका है जो 2014, 2017 व 2019 के चुनावों में पूरी तरह से भाजपा के साथ था और पश्चिम में भाजपा की जीत का निर्णायक भागीदार रहा था। रहा सवाल शेष उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार का तो बिहार विधानसभा चुनाव में वैक्सीन के मुद्दे पर राजनीति करने वाली भाजपा को जिला पंचायत के चुनाव में कोरोना की फैलती महामारी, आक्सीजन, दवाओं की कमी और समय पर इलाज न मिलना व जर्जर हो गए चिकित्सा तंत्र ने आम आदमी को झकझोर कर रख दिया जो भाजपा के लिए नाराजगी का कारण बना और जिस भाजपा को मोदी, शाह और योगी के कारण उत्तर प्रदेश में अजेय माना जा रहा था। उसी भाजपा को पंचायत चुनाव में ऐसी हार का सामना करना पड़ा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा के हक में आसान नहीं रहेंगे। जिसकी वह आस लगा हुए थी। बल्कि अयोध्या, काशी और मथुरा में भाजपा की एकतरफा हार दीवार पर लिखी उस इबारत की तरह है जिसे आसानी से समझा जा सकता है।

भाजपा को यह बात गांठ में बांधनी होगी कि धार्मिक और भावनात्मक मुद्दे, सरकारी विज्ञापनों में मोदी-योगी के यशगान और मीडिया के एक बड़े वर्ग को साध कर सिर्फ अपना ही कीर्तन करवाने से अपने चंद मुठ्ठीभर समर्थकों या यूं कहे अंधभक्तों को अपने पल्लू में बांधे रखा जा सकता है। बाकी आमजनता को नहीं। पहले से ही महंगाई की मार झेल रही आमजनता के लिए कोरोना एक किसी अभिशाप से कम नहीं है और उस पर से सोने पर सुहागा यह कि इलाज के लिए धर-धर भटकाना पडे़। दवाओं व आक्सीजन की कालाबाजारी के खिलाफ योगी सरकार का बहुत अधिक सक्रिय न रहना, यह तमाम ऐसे कारण रहे है कि जिला पंचायत चुनाव में आमजनता का आक्रोश भाजपा के खिलाफ ऐसा फूटा कि दिल्ली में बैठे भाजपा के रणनीतिकार भी सहम गए होंगे यह सोच कर कि कहीं ऐसा ही कुछ अगले विधान सभा चुनाव में भी न दोहाराया जाए। वैसे इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी बासी कढ़ी में उबाल एक बार आता है, बार-बार नहीं।

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