ओवैसी को अपनी राजनीति की धारा बदलनी चाहिए

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ओवैसी को अपनी राजनीति की धारा बदलनी चाहिए

वाम और मजलिस बिहार चुनाव से उभरी दो नयी सियासी शक्तियां

उबैदउल्लाह नासिर

बिहार विधान सभा का चुनाव संपन्न हो गया I महाभारत के किरदार अभिमन्यु की तरह राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष नवजवान नेता तेजस्वी यादव ने संघ परिवार द्वारा बनाया गया चक्रव्यूह तोड़ने की भरपूर ताक़त से लड़ाई लड़ी, अंतिम समय तक अर्थात पोलिंग के बाद दिए जाने वाले एग्जिट पोल तक में उनकी शानदार सफलता की बात कही जा रही थी लेकिन जब नतीजे आये तो कांटे की टक्कर बल्कि अंग्रेजी में कहें तो neck to neck fight (गला काट मुक़ाबला) में अंततः अभिमन्यु फिर हार ही गया I लेकिन विगत कई चुनावों और चुनावी मुहीम को याद करें तो यह पहली बार हुआ है कि विपक्ष के नेता ने चुनावी एजेंडा तय किया हो और संघ परिवार/बीजेपी और उससे जुड़ी दूसरी पार्टियों के गठबंधन NDA को उसी मुद्दे उसी एजेंडे पर घेरे रखा हो I बीजेपी के नेताओं मंत्रियों आदि ने पाकिस्तान में खुशियाँ मनाये जाने आतंकवादियों के आ जाने लव जिहाद भारत माता की जय जैसे मुद्दे उठाने की कोशिश ज़रूर की लेकिन रोज़गार भूख भ्रष्टाचार मजदूरों का पलायन ख़ास कर 10 लाख सरकारी नौकरियाँ देने का तेजस्वी का एजेंडा ऐसा प्रभावशाली था और बिहार के नवजवानों के दिलों को ऐसा छू गया था की बीजेपी को भी उसी एजेंडे पर आना पडा और 10 लाख के मुकाबले में 19 लाख लोगों को रोज़गार देने का वादा करना पडा I तेजस्वी चुनाव भले ही हार गया हो लेकिन एक तो उसने बीजेपी को अपने साम्प्रदायिक एजेंडे से दूर रखने में सफलता पायी दूसरे खुद वह बिहार ही नहीं देश की राजनीति में एक नयी शक्ति बन कर उभरा है जिसको लोग उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं की आने वाले दिनों में वह भारत की राजनीती का एक सितारा बन कर जगमगायेगा I

इसके साथ ही इन चुनावों में दो और सियासी शक्तियां उभर कर सामने आई हैं जिन पर देश भर के सियासी पंडित नज़रें जमाये हुए है I तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा बन कर चुनाव लड़ने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों का परफॉरमेंस चौंका देने वाला रहा है 29 सीटों पर लड़ कर 19 सीटों पर जीत दर्ज करना देश की राजनीति में लगभग मृत्यु प्राय वाम के लिए संजीवनी से कम नहीं ,और देश की राजनीति के लिए एक खुबसूरत मोड़ है I भारत की राजनीति में वाम पंथी शक्तियों की कमजोरी से ही घोर दक्षिण पंथी पार्टियों को उभरने का मौक़ा मिला है I देश के लिए वाम पंथ का शक्तिशाली होना बहुत ज़रूरी है I बिहार में उसकी इस सफलता का असर बंगाल में भी महसूस किया जाएगा जहां अगले वर्ष विधान सभा के चुनाव होने हैं और जिसे जीतने के लिए संघ परिवार एड़ी चोटी का जोर लगाये हुए है I

दूसरी सियासी ताक़त का बिहार के चुनाव में उभार जिस पर सब की निगाहें हैं वह है मजलिस इत्तेहादुल मुस्लेमीन (MIM) जिसने बहुजन समाज पार्टी और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी से गठबंधन कर के चुनाव लड़ा और बीस सीटों पर लड़ कर 5 सीटों पर सफलता दर्ज की I बुनियादी तौर से हैदराबाद और उसके आस पास के मुस्लिम बाहुल्य जिलों तक महदूद रहने वाली इस पार्टी ने अपने नवजवान नेता असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में पूरे देश में अपने विस्तार का फैसला किया और देश भर के उन क्षेत्रों और उन सीटों पर अपनी नज़र गड़ाई जहां मुसलमान अधिक ही नहीं बल्कि निर्णायक संख्या में है I असदुद्दीन ओवैसी उच्च शिक्षा प्राप्त एक प्रखर वक्ता हैं और लोक सभा में अपने निर्भीक भाषणों और मुद्दे पर बेहतरीन जानकारी से बोलने के कारण बेस्ट पर्लिमेंटेरियन का अवार्ड भी पा चुके हैं I सदन के बाहर भी अपने भाषणों और TV पर डिबेट्स में वह अपन पक्ष बहुत निर्भीकता और ठोस तर्कों पर रखते हैं ख़ास कर देश के मुसलमानों की समस्याओं पर पूरी ताक़त पूरी हिम्मत से अपनी बात कहने के कारण वह देश के मुसलमानो एक वर्ग में लोकप्रिय भी हैं I भारत की राजनीति में मोदीत्व के उभार के बाद मुसलमानों के प्रति नफरत और इस्लाम को बदनाम करने की एक योजनाबद्ध मुहीम चलाई जा रही है हालांकि यह मुहीम संघ परिवार अपने अस्तित्व से ले कर आज तक चलाता रहा है लेकिन मोदी युग में इस मुहीम को सरकारी संरक्षण मिला है और मीडिया जिसने हमेशा देश के सेक्युलर ताने बाने की रक्षा का फर्ज़ अदा किया वह भी इस मुहीम का हिस्सा बन गया I गैर भाजपाई पार्टियों ख़ास कर कांग्रेस को राष्ट्रविरोधी और मुस्लिम परस्त प्रचारित करके हिन्दू जन मानस की सोच को बदला गया और अब यह हालत कर दी गयी है की कोई भी सेक्युलर पार्टी सेकुलरिज्म के लिए वैसे अंदाज़ में आवाज़ नहीं बुलंद कर सकती जैसे आज से 10 साल पहले करती थी कोई भी पार्टी पूरी ताक़त से मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति वैसे मुखर नहीं हो सकती जैसे कभी हुआ करती थी I सभी पार्टियां सेकुलरिज्म और मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति झुके झुके ऊँट चराने वाली मिसाल पेश करती है ऐसे में चारों तरफ से कार्नर कर दिए जाना वाला मुसलमान विशेषकर नवजवान असदुद्दीन ओवैसी की बातों में अपना मर्म अपनी कसक देखता है और उनके प्रति आकर्षित होता है I

मजलिस इत्तेहादुल मुस्लमीन देश के संविधान पर विश्वास का शपथ पत्र दे कर भारत के चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत एक सियासी पार्टी है और उसे पूरे देश में अपने पंख फैलाने अपना विस्तार करने और देश में कहीं भी किसी भी सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार है Iलेकिन उसे सोचना होगा कि वह सिर्फ एक वर्ग विशेष की राजनीति करके वह अपना कितना विस्तार कर लेगी,देश की राजनीति को कैसे प्रभावित कर सकेगी और अपने कोर वोटर्स के संवैधांनिक अधिकारों और उनके हितों की कैसे रक्षा कर सकेगी ? अगर धार्मिक लामबंदी द्वारा वह लोक सभा की अधिकतम सीटें भी जीत लेती है तो वह सरकार के निर्णयों को कैसे प्रभावित कर सकेगी ? नदी में एक घड़ा पानी की क्या हैसियत होगी ? उतना पानी डाल दिया जाए या निकाल लिया जाये क्या अंतर पड़ेगा ? इसके साथ ही साथ उसको लेकर देश में जो सियासी माहौल बन रहा है वह बहुत खतरनाक रुझान की तरफ इशारा कर रहा है I दो राष्ट्रवाद का सिद्धांत फिर सर उठा रहा है I सोशल मीडिया पर ओवैसी ब्रांड राजनीति को लेकर मुस्लिम नवजवानों की वैसी ही प्रतिक्रिया सामने आ रही है जैसे संघवाद के जहर में डूबे हिन्दू नवजवानों की प्र्तिक्रियाए होती है I दोनों अपने अपने धर्मावलम्बियों की मज़लूमियत (Victim hood) की कथाएं,अपनी कौम के साथ होने वाले कथित अन्याय आदि को ले कर एक जैसी न केवल प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं बल्कि दोनों की भक्तभावना का रवय्या भी लगभग एक जैसा है, वही आक्रमकता वही गाली गलौज वही जिद और हठधर्मी और विरोधियों का चरित्रहनन और कांग्रेस तथा जवाहर लाल नेहरु के प्रति दोनों की एक जैसी नफरत और विरोध I यह माहौल दिल दहला देने वाला है इससे केवल संघ का एजेंडा ही मज़बूत हो रहा है I ऐसा लगता है की संघ की योजना के अनुसार देश में फिर धर्म के नाम पर लामबंदी ठीक उसी प्रकार हो रही है जैसी आज़ादी की लड़ाई के दौरान मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा के उभार से पैदा हुई थी I दोनों की ख्वाहिश यही थी कि केवल उन्ही को अपने अपने धर्मावलम्बियों की नुमाइंदा जमात समझा जाए जबकि कांग्रेस एक छाते के तौर पर देश के सभी धर्मों जातियों आदि को अपने साथ रखने की बात करती थी I मुस्लिम लीग कांग्रेस के मुस्लिम लीडरों यहां तक कि मौलाना आज़ाद जैसी शख्सियत को भी कांग्रेस का show boy कहती थी I हद तो यह हो गयी कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के क्षात्रों ने उन्हें जूते की माला तक पहनाई थी I 1936 में उत्तर प्रदेश में बनने वाली अंतरिम सरकार में लीग और कांग्रेस के बीच हुए समझौते के अनुसार तीन मुसलमान मंत्री बनाये जाने थे सरकार में मुस्लिम लीग के दो और कांग्रेस के एक मंत्री हाफ़िज़ इब्राहिम को शामिल किया गया जिस पर मुस्लिम लीग नाराज़ हो गयी क्योंकि वह मुसलमानों की इकलौती नुमायन्दा होने का दावा करके तीनों मुस्लिम मंत्री अपनी पार्टी के चाहती थी I दिलचस्प बात यह है महासभा और लीग ने बंगाल सिंध और NWFP में साझा सरकार बनाई थी बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी उप मुख्यमंत्री और मुस्लिम लीग के फज़ल हक मुख्य मंत्री थे I संघ परिवार आज भी उसे हिन्दू नहीं मानता जो उस से अलग विचारधारा और सोच रखता है I वह उन्हें जयचंद विभीषण आदि न जाने किन किन नामों से पुकारता है अन्यथा देश में आज़ादी के बाद से ले कर अब तक सारे प्रधानमंत्री हिन्दू ही हुए 99% से ज्यादा मुख्यमंत्री हिन्दू हुए सभी बड़े पदों पर हिन्दू बैठे लेकिन संघ ने उन्हें कभी हिन्दुओं का नुमायन्दा नहीं समझा I सोच और कार्यशैली में यही समानता लीगियों और महासभाईयों को तब और अब बीजेपी तथा MIM को एक ही सिक्के के दो पहलू बनाती है I इस सोच और इस विचारधारा से देश एक बार फिर भावनात्मक बटवारे की तरफ बढ़ रहा है अगर हिन्दू सिर्फ हिन्दू और मुस्लिम सिर्फ मुस्लिम की बात करेगा तो भारतीयता कहाँ बचेगी ? भारत की मुशतरका कौमी विरासत का क्या होगा ?

यह रुझान और यह सियासी माहौल संघ परिवार के एजेंडे को तो सूट करता है लेकिन देश के लिए बहुत ही हानिकारक होगा देश एक बटवारे की कीमत अभी तक अदा कर रहा है दूसरे बटवारे भले ही वह भावनात्मक ही क्यों न हो की कीमत नहीं चुका पायेगा क्योंकि यह देश को अन्दर से खोखला कर देगा I इस रुझान को बदलने की ज़िम्मेदारी असदूद्दीन ओवैसी पर भी है और सभी सेक्युलर सियासी पार्टियों की भी I असद साहब को चाहिए की वह अपनी पार्टी का विस्तार धर्म की बुनियाद पर कंरने के बजाय देश के सामने पेश चुनौतियों से लड़ने की बुनियाद पर करें क्योंकि यह चुनौतियां देश के सभी नागरिकों को धर्म जाति और क्षेत्र से ऊपर उठ कर प्रभावित करती है I भूक, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय संसाधनों की लूट,अंधाधुंध निजीकरण,ही नहीं संविधान की भावनाओं को ठीक से लागू न किया जाना, धर्म जाति क्षेत्र की बुनियाद पर सरकारों के फैसले,संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ संवैधानिक संस्थाओं की रीढ़ की हड्डी तोड़ देना, संवैधानिक लोकतंत्र को खतरे में डालना,भीड़तन्त्र को लोकतंत्र पर हावी करना,आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन से देश का प्रत्येक नागरिक प्रभावित होता है इन सबको मुद्दा बना कर असद साहब अपनी क्षमता और सलाहियत से अपनी पार्टी को विस्तार दे सकते है I देश को उनकी ज़रूरत है लेकिन उनकी ब्रांड सियासत की नहीं I

सेक्युलर सियासी पार्टियों ख़ास कर कांग्रेस को भी सोचना होगा की वह संघ परिवार के आक्रामक प्रोपगंडा के डर से अपनी मौलिक सोच से अलग कैसे हो सकती है नर्म हिंदुत्व का जो ज़हर उसकी रगों में घोला जा रहा है वह उसकी बर्बादी का कारण बन रहा है Iराहुल गाँधी इस खतरे को समझ रहे हैं कांग्रेस में वह अपने दम पर संघ की खतरनाक सोच के खिलाफ लड़ रहे हैं लेकिन कांग्रेस के अधिकतर सीनियर नेता इस नर्म हिंदुत्व को ही पार्टी के लिए मुफीद समझ रहे हैं जबकि यह देश और पार्टी दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है I कांग्रेस अपने मौलिक स्वरुप में ही देश के जन मानस को स्वीकार्य होगी उसे secularism और देश के अल्पसंख्यकों को संविधान में दिए गए अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताक़त से मैदान में उतरना होगा और देश के धर्म निरपेक्ष स्वरुप की रक्षा के लिए सदन और सड़क दोनों जगह लड़ना होगा I बीजेपी मोदी के नेत्रित्व में अपने उभार के चरम पर पहुँच चुकी है फिर भी वह केवल 35% वोट ही पा सकी है अर्थात देश की 65% जनता अब भी उसकी और ख़ास कर उसकी विचारधारा की विरोधी है I भारतीयता और देश की सांझी राष्ट्रीय विरासत को संजोने की ख्वाहिश रखने वालों के लिए यह बहुत ही हौसला देने वाली बात है I चरम पर पहुँच कर उतार का आगाज़ होना प्रकृति का नियम है बीजेपी भी उससे अछूती नहीं रह सकती I कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों और खुद ओवैसी को इन्ही 65% लोगों को एक लड़ी में पिरो कर सामप्रदायिक फासीवादी शक्तियों को शिकस्त देने की मुहीम चलानी चाहिए यही देश और सभी देश वासियों के हित में है I

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