मौत को दे दी मात, 10 प्रतिशत उम्मीद से बची जिंदा

मेरठ रीजनमौत को दे दी मात, 10 प्रतिशत उम्मीद से बची जिंदा

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मौत को दे दी मात, 10 प्रतिशत उम्मीद से बची जिंदा

  • मेरठ कॉलेज की प्रोफेसर ने 25 दिन तक कोरोना से लड़ी जंग
  • 90 प्रतिशत फेफड़े हो गए थे खराब, डॉक्टर्स बोले- चमत्कार

अमित बिश्‍नोई

मेरठ। कोरोना संक्रमण की खतरनाक स्टेज पर पहुंचकर जहां मरीज ही ख़ुद जिंदा रहने की उम्मीद छोड़ दे रहा हो, वहाँ एक महिला मरीज ने केवल इस जंग में विजयी श्री हासिल ली, बल्कि मजबूत विल पावर के जरिये ख़ुद को मौत के मुंह से निकाल दूसरों के लिए भी मिसाल कायम की है।

25 दिन तक लड़ी जंग

मेरठ कॉलेज में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ ममता शर्मा 17 अप्रैल को बुखार से पीड़ित हो गई थी. उनके पति डॉ सुधीर ने बताया धीरे-धीरे उनका बुखार बढ़ रहा था चूंकि उनकी बेटी दिल्ली में पहले से पॉजिटिव थी, ऐसे में उन्होंने कोरोना के स्टैंडर्ड प्रोटोकोल को फॉलो करते हुए उससे व डॉक्टर की सलाह ओर होम आइसोलेशन की दवाइयां पत्नी को दे दी। उन्होंने बताया दवाइयों के बाद भी पत्नी का बुखार लगातार बढ़ता जा रहा था। 20 अप्रैल को उन्होंने डॉ की सलाह पर कोरोना जांच करवाई लेकिन रिपोर्ट 72 घंटे बाद मिलनी थी। एहतियातन उन्होंने पत्नी का एंटीजन टेस्ट भी करवा लिया। जिसमें वह पॉजिटिव आई। सुधीर बताते हैं 21 अप्रैल को पत्नी का बुखार 104 तक पहुंच गया था। डॉक्टर की सलाह पर एचआरसीटी यानी हाई रेज्यूलेशन कंप्यूटेड टोमोग्राफी करवाई।जिसमें उनमें स्कोर 2 यानी मामूली निमोनिया की पुष्टि हुई और ऑक्सीजन लेवल भी 95 प्रतिशत था। उन्होंने बताया की पत्नी का बुखार नहीं उतर रहा था, इसलिए वह उन्हें तुरंत निजी अस्पताल ले गए। चूंकि अस्पताल में उस वक़्त कोविड वार्ड में जगह नहीं थी इसलिए डे केयर में ही ट्रीटमेंट दिलवाया और घर ले आए। लेकिन उनकी पत्नी की हालत में सुधार नहीं हो रहा था। जिसके बाद 22 अप्रैल को उन्होंने दोबारा पत्नी को निजी अस्पताल में भर्ती करवाया।

बिगड़ने लगी तबीयत

सुधीर बताते हैं कि उनकी पत्नी की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। हालांकि बीच-बीच में उनसे संपर्क कर रहे थे। वह बताते हैं की एक दो दिन एडमिट होने के बाद ही पत्नीऑक्सीजन सपोर्ट पर आ गई थी और 25 अप्रैल की सुबह उन्हें अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म होने की जानकारी प्राप्त हुई। तब तक उनकी पत्नी की तबीयत पूरी तरह बिगड़ चुकी थी। ऑक्सीजन सपोर्ट पर उनका spo2 लेवल 70 प्रतिशत पर पहुंच गया था। स्थिति को देख अस्पताल मैनेजमेंट ने उन्हें किसी एल-3अस्पताल में ले जाने की सलाह भी दी लेकिन उन्होंने वहीं पर पत्नी का एंटीजन टेस्ट करवाया और नेगेटिव आने पर उनको जनरल वार्ड में शिफ्ट करवा दिया गया।

डॉक्टर बोले 90% फेफड़े खराब

सुधीर बताते हैं कि यहां पर एडमिट होने के बाद डॉक्टर ने पत्नी की दोबारा जांच की और बताया कि इंफेक्शन बहुत ज्यादा हो चुका है। तकरीबन 90 प्रतिशत तक फेफड़े डैमेज हो गए हैं। जिसके बाद उन्हें किसी दूसरे अस्पताल में जहां बाईपेप की सुविधा हो वहां ले जाने की सलाह भी दी। डॉक्टर सुधीर बताते हैं कि मेरठ के अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही थी। ऐसे में उन्होंने कहीं दूसरी जगह ले जाने की व्यवस्था कर ही रहे थे तभी अस्पताल के डॉक्टर ने उनकी समस्याओं और पत्नी की बेहद नाजुक स्थिति को देखते हुए पत्नी को अचानक आईसीयू में शिफ्ट कर दिया। वह बताते हैं कि 25 अप्रैल की शाम को पत्नी की हालत बहुत ज्यादा नाजुक हो चुकी थी। जांच में उनका एचआरसीटी स्कोर 25 में से सिर्फ 22 रह गया था। वही ऑक्सीजन लेवल भी बहुत कम हो चुका था। डॉ सुधीर बताते हैं कि यह वक्त बहुत मुश्किल था ऐसा लग रहा था कि किसी भी पल अप्रिय सूचना मिल सकती है।

बची दस प्रतिशत उम्मीद

डॉक्टर सुधीर बताते हैं कि आईसीयू में पत्नी की हालत देखकर डॉक्टर्स ने उन्हें कहा कि उनकी पत्नी लास्ट स्टेज पर है। और जो इलाज वह देने जा रहे हैं उसके साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा है। अगर उनकी पत्नी इसे झेल जाती हैं तब शायद उनका जीवन बच सकता है। हालांकि डॉक्टर से उनको साफ कह दिया था कि उनकी पत्नी के बचने के सिर्फ और सिर्फ 10% ही उम्मीद बची है लेकिन फिर भी उनकी जान बचाने के लिए मैं अपना बेस्ट देने की कोशिश करेंगे।

मजबूत विल पावर से जीत की जंग

डॉक्टर सुधीर कहते हैं जाको राखे साईयां, मार सके न कोई….. वे कहते हैं कि उनकी पत्नी के साथ भी कुछ ऐसा ही चमत्कार हुआ और अपनी मजबूत विल पावर के चलते वह जीवन-मरण के युद्ध में जीत गयी और कोरोना को हराने में कामयाब हुई। डॉक्टर सुधीर कहते हैं कि इलाज के करीब 48 घंटे बेहद मुश्किल थे लेकिन यह उनकी पत्नी की मजबूत इच्छाशक्ति थी जिसने उन्हें इस मुश्किल से ना केवल बाहर निकाला बल्कि दूसरों के लिए भी हौसले की मिसाल कायम की है। वह बताते हैं के आईसीयू से बाहर आने के बाद भी पत्नी ने अपने करीब आसपास 14 लोगों को जान गंवाते देखा, लेकिन उन्होंने कतई हिम्मत नहीं हारी। वह बताते हैं इस जंग में डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन ने उनका काफी सहयोग किया जिसकी वजह से वह अपनी पत्नी को मौत के मुंह से बाहर निकाल पाए।

खाने पर किया फोकस

डॉक्टर सुधीर बताते हैं कि उनकी पत्नी को पता था कि जीने के लिए खाना बेहद जरूरी है। इसलिए उन्होंने खाने पर पूरा फोकस किया। उनको अस्पताल की ओर से जो भी खाना मिलता था वह उसको प्रॉपर खाती थी। अस्पताल में पूरे दिन में हर बार की डाइट में पपीता होता था और वह इसको जरूर खाती थी। वह बताते हैं कि 12 मई को पत्नी अस्पताल से डिस्चार्ज हुई। उसके बाद भी अपनी डाइट का पूरा ध्यान रखती हैं। खाने में किसी प्रकार की लापरवाही उन्होंने एक दिन भी नहीं बरती। इसके अलावा डिस्चार्ज होने से पहले डॉक्टर्स ने उन्हें कुछ एक्सरसाइज करवाई थी जो उन्होंने बहुत बढ़िया तरीके से की और यहां तक की अब वह लगातार इन एक्सरसाइज को करती है। इसमें कपालभाती, डीप ब्रीदिंग, प्राणायाम जैसी क्रियाएं शामिल हैं। वह बताते हैं कि वे खुद भी करीब डेढ़ घंटा दिन में रनिंग और एक्सरसाइज करते हैं।

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