सुनील शर्मा
मैं पेड़ हूं, या यूं कहें की पेड़ था, विकास की भेंट चढ़ कर मैं भी शहीद हो गया। अब बस ठूंठ बचा हूं जिसे न जाने कब जड़ से उखाड़ दिया जाये। मुझे काटने से चंद लोगों को लाभ हुआ होगा मगर हजारों लोगों को कितना नुकसान हुआ यह कोई समझ नहीं पाया। आज लोग उखड़ती सांसों के साथ अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। ऑक्सीजन पाने को गुहार लगा रहे हैं ताकि उनका जीवन बच जाये। ऑक्सीजन फैक्ट्रियों के बाहर लोग ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर घंटों तक खड़े रहते हैं। ऑक्सीजन पाने को लोग मुंहमांगी कीमत अदा करने को तैयार हैं। मगर यह ऑक्सीजन तो मैं सालों से देता आ रहा था वो भी बिना किसी कीमत के। मैंने तो कभी किसी से कुछ नहीं मांगा बल्कि सबको कुछ न कुछ देता ही आया। मगर मुझे भी काट दिया इंसानों ने, चढ़ा दिया विकास की भेंट। अब इसी विकास की कीमत चुका रहे हैं लोग और चंद किलो ऑक्सीजन पाने के लिये भटक रहे हैं। अब जिस इंसान को जीवन भर शुद्ध हवा दी, फल दिये, गर्मी में ठंडी छांव दी, अनेक बीमारियों से बचाया उन्हें अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखता हूं तो हर रोज मरता हूं, बार-बार मरता हूं।
आज मेरा मन बड़ा व्यथित है। मानव जिसे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति कहा जाता है वह भी मेरे महत्व को समझ नहीं पाया। उसकी निगाह में मैं एक बेजान पेड़ ही रहा जिसे उसने अपनी जरूरतों के लिये काट दिया। मगर वह नहीं समझ पाया कि मैं उसकी कितनी जरूरतों को पूरा करता था। आज हास्पिटलों के बाहर आॅक्सीजन बेड के लिये गुहार लगाते मरीजों का रूदन, अपनों की उखड़ती सांसों को रोकने में नाकाम परिजनों का विलाप, दम तोड़ते मरीजों की पुकार, बिना ऑक्सीजन के प्राण छोड़ते बीमारों के परिवार के चीखने की आवाज मेरे हद्य को द्रवित कर रही हैं। मैं बहुत कुछ कर सकता था इन सब के लिये मगर इंसानों ने मुझे कुछ करने लायक नहीं छोड़ा। मेरे अंग-अंग को काटने वाले यह नहीं समझ पाये की वो मेरी डाल नहीं अपनी सांसों की डोर को काट रहे हैं।
मैं पेड़ था तो हर साल 100 किलो ऑक्सीजन देता था। ऑक्सीजन देता था, भूक्षरण रोकता था, उर्वरक बनाता था पानी रिसाइकल करता था और हवा को शुद्ध भी करता था। ये सब काम कर मैं अपने 50 साल के जीवन में 5 करोड़ रुपए कीमत की सेवाएं इंसान को देता था। एक साल में 30 लाख रुपये कीमत की ऑक्सीजन देता था। मैं पेड़, हवा फिल्टर कर फेफड़ों को बचाता था, स्माॅग कम करता था। प्रदूषित हवा से 108 किलोग्राम तक छोटे कण और गैस सोख था। साल में 3700 लीटर पानी रोक कर ग्राउंडवाटर बढ़ता था। बाढ़ से बचाता था, तापमान कम करता था। खराब पर्यावरण से होने वाली मौतों को 9 फीसदी तक कम कर हर साल 36,000 लोगों की जान बचाता था। और यह मैं नहीं कह रहा यह तो इंसानों द्वारा किये गये शोध ही कहते हैं जिसे खुद इंसानों ने ही नहीं माना। पेड़ कटते गये, ऑक्सीजन कम होती गयी और अब लोग कह रहे हैं कि पेड़ काट कर गलती की। अरे अब पछतावत होत क्या जब काट दिये इतने पेड़।मगर मेरे ये सब काम इंसान को नहीं दिखे। उसने तो सिर्फ अपना विकास देखा, वर्तमान देखा। यदि एक बार भविष्य की ओर निगाह डाली होती तो आज ऑक्सीजन सिलेंडर लिये लाइनों में खड़ा नहीं होता। लोग चंद किलो ऑक्सीजन लेने के लिये आपस में झगड़ा न करते। अरे इंसानों तुम्हारी निगाह में मैं भले ही बेजान था मगर इतना तो समझते की प्राचीन काल से ही पेड़ों को क्यों पूजा जाता है। क्यों आंगन में नीम का पेड़ उगाया जाता है, क्यों पीपल, बरगद, अर्जुन के पेड़ों को देवता समान मान कर उनकी समय-समय पर पूजा की जाती है। अरे तुम तो पृथ्वी के सबसे समझदार जीव हो फिर कैसे नहीं समझ पाये की पेड़ नहीं होंगे तो जीवन भी नहीं होगा। अरे जीते-जी इतना कुछ देने के बाद मैं बूढ़ा भी हो जाता तो मेरी लकड़ियां जलाने के काम आती। कम से कम मेरे मरने का इंतजार तो कर लेते, क्यों मुझे जिंदा ही काट कर खुद अपने जीवन की डोर छोटी कर ली।
यदि आज भी इंसान नहीं रूका और मेरे जैसे पेड़ों का अंधाधुंध दोहन करने से बाज नहीं आया तो चैथा विश्वयुद्ध जल की बजाये ऑक्सीजन के लिये भी हो सकता है। आज पौधे कम लगाये जा रहे हैं मगर पेड़ अंधाधुंध काटे जा रहे हैं। आज ऑक्सीजन की कमी हो रही है, वायुमंडल में कार्बनडाइ आॅक्साइड की मात्रा बढती जा़ रही है। बढ़ते प्रदूषण के कारण सांस लेना भी दुर्भर होता जा रहा है तो जीवन कैसे सुरक्षित होगा। ऑक्सीजन चाहिये तो पेड़ों को बचाना होगा। आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ रखना है तो पौधे लगाने भी होंगे और उनको संरक्षित भी करना होगा। प्राणवायु का स्तर सुधार कर पर्यावरण बचाना होगा ताकि इंसानों के प्राणों को भी बचाया जा सके। मेरे जैसे वृक्षों को सहेजने का संकल्प लेना होगा ताकि मैं जीवन पर्यंत इंसानों को क्सीजन दे सकूं।
मैं तो पेड़ हूं जीते-जी भी इंसानो के काम आऊंगा और मरने के बाद भी उनको कुछ न कुछ देकर जाऊंगा। मगर मैं लोगों को यूं मरते नहीं देख सकता। यकीन मानों मैं इंसानों का जीवन बचा सकता हूं। इसलिये अपनों के जीवन की रक्षा के लिये मुझ जैसे पेड़ों को मत काटो। जब जीवन ही नहीं रहेगा तो विकास कर के भी क्या हासिल होगा। और मेरे बिना जीवन संभव नहीं है यह तो अब तक इंसानों के समझ में आ ही गया होगा।

