Neelkanth Mahadev Mandir – यहां विषपान के बाद भोलेनाथ ली थी ध्यान समाधि

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ऋषिकेश – भगवान शिव की तपस्थली कहे जाने वाले उत्तराखंड में भगवान शंकर के कई धार्मिक स्थल आपको देखने में को मिलेंगे. आज हम आपको भगवान शिव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जहां भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा करने के लिए विश्व पी लिया था, जी हां हम बात कर रहे हैं नीलकंठ महादेव मंदिर की. ऋषिकेश से 32 किलोमीटर दूर बैराज होते हुए और 22 किलोमीटर राम झूला होते हुए नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचा जा सकता है. श्रावण मास में शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रचलित है अपितु मंदिर का पौराणिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम आपको यहां बार-बार आमंत्रित करती है.

धार्मिक महत्व

नीलकंठ महादेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले के मणिपुर पर्वत पर मधुमति और पंकजा नदी के संगम पर स्थित है. हर साल यहां लाखों कावड़िए भोले का अभिषेक करने के लिए पहुंचते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन में जब हलाहल नाम का विष निकला तो उसे ना तो देवता और ना ही असुर लेना चाहते थे. विष इतना घातक था कि पूरी पृथ्वी का विनाश कर सकता था. इस विष की तपिश से दसों दिशा जलने लगी तब ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान भोलेनाथ ने विष का पान किया. भगवान शंकर जब विष का पान कर रहे थे तो माता पार्वती उनके पीछे बैठी थी और उन्होंने भगवान शिव शिव का गला पकड़ लिया. जिससे विष ना तो बाहर आ सका और ना ही शरीर के अंदर जा सका. लेकिन महादेव का गला नीला पड़ गया.विष की गर्मी से भगवान भोलेनाथ भी बेचैन हो गए और ठंडक पाने के लिए भोलेनाथ हिमालय की और निकल गए. कहा जाता है कि मधुमति -पंकजा नदी के संगम पर एक वृक्ष के नीचे वह ध्यान में लीन हो गए. विषपान करने से उनका गला नीला पड़ गया था, जिसकी वजह से उन्हें नीलकंठ ना मिला. कहा जाता है कि जिस वृक्ष के नीचे महादेव ध्यान में लीन हुए थे वहां पर नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है.

प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिकता का अनूठा संगम

नीलकंठ महादेव मंदिर स्वर्ग आश्रम से 22 किलोमीटर दूर स्थित है. मंदिर जाने के लिए 12 किलोमीटर की सड़क घने जंगलों से घिरी हुई है. जहां से गुजरते हुए आपको अनुपम प्रकृति के दर्शन होंगे. मंदिर में पहुंचकर आपको आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होगी. नीलकंठ महादेव मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी आपको आकर्षित करेगी. मंदिर में समुद्र मंथन के दृश्य को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है. यही नहीं गर्भ ग्रह के प्रवेश द्वार पर आपको एक विशाल चित्र में भगवान भोलेनाथ विष पीते हुए दिखाई देंगे.

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