नाकाम सिस्टम ने अंतिम संस्कार का हक भी छीना

मेरठ रीजननाकाम सिस्टम ने अंतिम संस्कार का हक भी छीना

Date:


नाकाम सिस्टम ने अंतिम संस्कार का हक भी छीना

कोरोना संक्रमित संतोष कुमार का अज्ञात में कर दिया अंतिम संस्कार
23 अप्रैल को मृत्यु हो जाने के बावजूद 3 मई तक देते रहे अपडेट

मेरठ। कोविड मरीजों का उचित इलाज करने का दावा करने वाले मेरठ के एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज के नाकाम सिस्टम ने एक मरीज के परिवार से उनका अंतिम संस्कार का हक भी छीन लिया। पीड़ित परिवार जहां अपने को खोने के दर्द में डूबा है वहीं उनको यह गम भी है कि वह अपने मरीज का अंतिम संस्कार भी न कर सके।

इसके लिये जिम्मेदार है लापरवाह सिस्टम जिसे न मरीज की चिंता है और न ही उनके परिवार की संवेदनाओं की। जो नहीं जानता कि जो मरीज उसकी निगाह में एक संख्या है वह किसी परिवार की नींव है, किसी परिवार की उम्मीद है जिसके चले जाने से पूरा परिवार बिखर जाता है। और मरीज को बचा तो नहीं सके कम से कम उसके अंतिम संस्कार का हक तो न छीनते। अब चंद दिनों की जांच, कुछ दिनों की कार्रवाई के बाद मेडिकल कॉलेज में सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा मगर संतोष कुमार को खोकर उनके अंतिम संस्कार करने से भी वंचित परिवार के लिये पहले जैसा कुछ नहीं रहेगा।

बरेली के संतोष कुमार का अज्ञात के रूप में अंतिम संस्कार करने वाले मेरठ के एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज के दामन पर लगा दाग शायद ही कभी धुल पाये। लेकिन कोरोना संक्रमितों के शव तक बदलने की लापरवाही करने वाले मेडिकल कॉलेज के लिये ऐसी लापरवाही करना कोई नयी बात नहीं है। 21 अप्रैल को एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराये गये बरेली के संतोष कुमार की 23 अप्रैल को मृत्यु हो जाने के बावजूद उनके परिवार को सूचना तक नहीं दी गयी। हद तो यह है कि 3 मई तक संतोष नामक दूसरे मरीज का अपडेट बरेली निवासी संतोष कुमार के परिवार को दिया जाता रहा। 3 मई की सुबह के बाद से संतोष कुमार के बारे में जानकारी न मिलने पर परिवारजन जब मेडिकल कॉलेज गये तो उनसे कह दिया गया कि आपका मरीज खुद उठकर कहीं चला गया होगा। संतोष कुमार की बेटी शिवांगी ने जब सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड कर सीएम योगी आदित्यनाथ से गुहार लगायी तो अधिकारियों में खलबली मच गयी। इस मामले की जांच हुई तो संतोष कुमार की मृत्यु 23 अप्रैल को ही हो जाने की बात सामने आयी। दुःखद यह रहा कि संतोष कुमार का अज्ञात मेें अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।

अब प्राचार्य डा. ज्ञानेंद्र सिंह ने ड्यूटी पर तैनात स्टाफ और तीन डाक्टरों से जवाब मांगा है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह महज एक खानापूर्ति हैं। चंद दिनों तक नूराकुश्ती चलती रहेगी, फाइलेें इधर से उधर होती रहेंगी और फिर एक दिन सब ठंडे बस्ते में चला जायेगा। क्योंकि मेडिकल कॉलेज में मरीजों के इलाज में अक्सर अंगुुलियां उठती रहती है। कोरोना मरीजों के शव की अदला-बदली कर मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर देने वाला मेडिकल कॉलेज संतोष कुमार के अज्ञात में अंतिम संस्कार करने की बड़ी गलती को भूलने में देर नहीं लगायेगा। दुख की बात यह है कि मेडिकल कॉलेज पर मंडलायुक्त खुद निगाह रखे हुए हैं और अनेक बार मेडिकल कॉलेज का दौरा कर सब कुछ दुरस्त होने का दावा भी करते रहते है। अब उनकी निगाह के नीचे ऐसा शर्मनाक कृत्य होना मेरठ की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल तो उठाता ही है।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related