अमित बिश्नोई
संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सरकारी सेवा में लेटरल इंट्री यानि पीछे के दरवाज़े से नौकरशाहों की नियुक्तियां या फिर कह सकते हैं कि सत्ता में बैठी सरकार की मनमर्ज़ी वाले अधिकारीयों की नियुक्तियों के लिए आवेदन आमंत्रित करने के सिर्फ 72 घंटे बाद केंद्र की मज़बूत मोदी सरकार ने 20 अगस्त को अपना निर्णय वापस ले लिया, यानि की मोदी सरकार ने अपने फैसले पर यू टर्न ले लिया जो पिछले एक दशक के दौरान बहुत बिरले ही देखा गया है लेकिन इस यू टर्न से किसी को हैरत नहीं हुई क्योंकि मोदी 3.0 के अल्पकाल में अबतक कई ऐसे मौके आये हैं जब मोदी सरकार को अपनी मर्ज़ी के खिलाफ विपक्ष के दबाव में अपने लिए गए फैसलों पर कदम खींचने पड़े हैं, उन क़दमों में ये एक बड़ा कदम है जिसे सही मायनों में यू टर्न कहा जा सकता है.
आज जब दोपहर को ये ब्रेकिंग न्यूज़ आयी कि केंद्र की मोदी सरकार ने यूपीएससी अध्यक्ष को पत्र लिखकर अनुबंध के आधार पर 24 मंत्रालयों में संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उप सचिवों के 45 पदों पर लेटरल इंट्री के लिए आवेदन मांगने वाले विज्ञापन को वापस लेने को कहा है तो एक बारगी थोड़ा हैरानी हुई, इसलिए नहीं कि मज़बूत प्रधानमंत्री मोदी ने इस तरह का फैसला लिया बल्कि इसलिए कि सुबह तक भगवा ब्रिगेड जिसमें सरकार के कई मंत्री भी शामिल थे इस मुद्दे पर विरोध कर रही कांग्रेस पार्टी से जवाब मांग रहे थे कि मनमोहन सिंह, सैम पित्रोदा, रघुराम राजन, मोंटेक सिंह अहलूवालिया की एंट्री यानि नियुक्ति उस समय की कांग्रेस सरकारों ने किस तरह की लेकिन कुछ ही घंटे में विज्ञापन वापस लेने का निर्देश जारी होना बहुत से सवालों को जन्म दे गया, इस सवाल को भी कि क्या सरकार वाकई में मज़बूत है या फिर मजबूर।
ज़ाहिर सी बात है कि इतने बड़े मुद्दे पर सरकार का कदम वापस खींचना विपक्ष के हौसले बढ़ाता है, जो पहले से ही काफी उत्साह में है और सरकार को तमाम मुद्दों पर मज़बूती के साथ घेर रहा है. सरकार के इस यू टर्न को कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री मोदी की हार और संविधान की जीत बता रही है. सरकार की UPSC को लिखी चिट्ठी पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए कांग्रेस पार्टी की लड़ाई ने भाजपा के आरक्षण छीनने के मंसूबों पर पानी फेर दिया। Lateral Entry पर मोदी सरकार की ये चिट्ठी साबित करती है कि तानाशाही सत्ता के अहंकार को संविधान की ताक़त ही हरा सकती है. राहुल गाँधी जो आज अपने संसदीय क्षेत्र में हैं सुबह लेटरल एंट्री पर प्रतिक्रिया दी थी कि भाजपा की ‘लेटरल एंट्री’ जैसी साजिशों को इंडिया गठबंधन हर हाल में नाकाम कर के दिखायेगा और कुछ घंटों में सरकार का निर्देश ये सन्देश दे गया कि वो अपने मकसद में कामयाब हो गये.
इस फैसले को विपक्ष की बड़ी जीत और सरकार की बड़ी हार के रूप में देखा जा रहा है. दरअसल इस मुद्दे पर सिर्फ विपक्ष ही विरोध नहीं कर रहा था, सरकार के महत्वपूर्ण सहयोगी जेडीयू, तेदेपा और लोजपा भी अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे थे. जदयू के केसी त्यागी ने कहा कि जेडीयू एक ऐसी पार्टी हैं जो शुरू से ही सरकारों से कोटा भरने के लिए कह रही है। सरकार का यह आदेश हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है। उनकी चिंता इस बात पर भी थी कि सरकार के इस फैसले ने विपक्ष को एनडीए पर हमला करने का एक मुद्दा दे दिया। त्यागी ने चिंता जताई कि राहुल गांधी अब सामाजिक रूप से वंचितों के चैंपियन बन जाएंगे। चिराग़ पासवान ने भी सरकार के इस कदम का खुलकर विरोध किया और कहा कि यह उनके लिए चिंता का विषय है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि लोजपा लेटरल एंट्री के समर्थन सरकार के साथ नहीं हैं.
ऐसे में समझ में आता है कि मोदी सरकार ने सिर्फ 72 घंटे में ही अपने इस फैसले पर यू टर्न क्यों लिया जिसका भाजपा जमकर समर्थन कर रही थी और सरकार के बचाव में तमाम दलीलें दे रही थी, सिर्फ दलीलें ही नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी कटघरे में खड़ा कर रही थी. वैसे यह पहला मामला नहीं है. अगर हम देखे तो पाएंगे कि पिछले कुछ समय से ऐसा बार बार हो रहा है जब सरकार को अपने कदम को लेकर सफाई देनी पड़ी है कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं. अभी कुछ ही दिन पहले वक़्फ़ बिल को विपक्ष के भारी विरोध की वजह से JPC को भेजना पड़ा, ये भी मोदी सरकार के लिए एक नया तजुर्बा है, कहा जा रहा है विवादित ब्राडकास्टिंग बिल भी सरकार ने ठन्डे बस्ते में डालने का फैसला कर लिया है. कहना का मतलब ये है कि मोदी 3.0 में सरकार के वो तेवर क्यों नज़र नहीं आ रहे हैं जो पिछले 10 बरसों में नज़र आ रहे थे. ऐसा क्यों लग रहा कि NDA सरकार बुरी तरह हताश है. किसी मामले को वो पहले जैसी आक्रमकता के साथ क्यों नहीं उठा पा रही है, उसकी बातें, उसके तर्क उस तरह लोगों तक क्यों नहीं पहुँच पा रहे हैं जैसा कि पहले पहुंचा करते थे, प्रधानमंत्री को आवाज़ ईको करती थी, कानों को मोदी मोदी सुनने की आदत पड़ गयी थी लेकिन नई सरकार में वो गूँज सुनाई नहीं दे रही है, सोशल मीडिया जहाँ पर पहले भाजपा का एकाधिकार था, वहां भी सरकार और पार्टी को बैकफुट पर जाना पड़ रहा है. हर तरफ बस एक ही सवाल है कि अपने फैसलों पर चट्टान की तरह अटल रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी अपने कदम वापस पीछे क्यों लेने लगे हैं? कहाँ चला गया उनका करिश्मा, कहाँ चली गयी उनकी वो “एक अकेला सबपर भारी वाली दहाड़”.

