तौक़ीर सिद्दीकी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान अब बेहद करीब है और 10 फरवरी को मतदान से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में घमासान मचा हुआ. जाट बेल्ट कहें या किसान बेल्ट, राजनीति अपने शबाब पर है, किसान आंदोलन ने इस शबाब को और निखार दिया है. जहाँ पिछले कई चुनावों से भाजपा इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम किये हुए है वहीँ सपा-रालोद गठबंधन, बसपा और लड़की हूँ लड़ सकती हूँ के बाद फिर से उभरती कांग्रेस इस वर्चस्व को तोड़ने में जी जान से जुटी हुई हैं. हालाँकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत खेत खलिहानों और गाँव की चौपालों से निकलकर फलती फूलती है और पार्टियों के लिए सत्ता के शिखर तक पहुँचने का मार्ग दर्शन करती है मगर मेरठ शहर की सियासत का भी अपना महत्व है, मेरठ शहर को एक तरह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजधानी भी माना जाता है इसलिए मेरठ पर चुनावी चर्चा न हो तो बात अधूरी सी लगती है, इसलिए आज हम बात करते हैं मेरठ शहर की कैंट विधान सभा क्षेत्र की जिसपर भाजपा का कब्ज़ा है और यह कब्ज़ा कई दशकों से है. आंकड़ों के सहारे और बदली हुई वर्तमान परिस्थितियों की मदद से हम जानने की कोशिश करते हैं कि क्या इसबार भी भाजपा की ही बयार बहने वाली है या फिर नई पार्टी, नया उम्मीदवार और नई सरकार।
अगर हम मेरठ कैंट असेम्ब्ली सीट (meerut cantt assembly seat) के चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो पाएंगे कि यहाँ का मतदाता काफी हद तक स्पष्ट रहता है कि किसके साथ रहना है और विशेष बात यह कि जिस भी पार्टी का समर्थन किया, जमकर किया और देर तक किया। शायद यही वजह है कि अबतक के विधानसभा चुनावों में उसने सिर्फ कांग्रेस और भाजपा का साथ दिया, अपवाद स्वरुप सिर्फ एकबार 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के वी त्यागी ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था. 1989 तक कैंट सीटपर कांग्रेस पार्टी का राज रहा लेकिन उसके बाद भाजपा ने इस सीट पर अंगद की तरह ऐसा पाँव जमाया कि कोई भी आजतक उसे हिला नहीं पाया।
पिछले 6 चुनावों से इस सीट पर अग्रवालों का दबदबा है. 12 वीं और 13 वीं विधानसभा में क्षेत्र का कामयाबी से नेतृत्व करने वाले अमित अग्रवाल को भाजपा ने एकबार फिर उम्मीदवार बनाया है, हालाँकि पिछले चार विधानसभा चुनावों में सत्यप्रकाश अग्रवाल कमल का फूल खिला रहे हैं, मगर शायद बढ़ती उम्र को देखते हुए पार्टी ने उन्हें आराम करने का मौका दिया है. अमित अग्रवाल के सामने मुख्य विपक्षी के रूप में गठबंधन उम्मीदवार मनीषा अहलावत हैंडपंप से भरपूर पानी निकालने की कोशिश में हैं तो बसपा के हाथी पर अमित शर्मा सवार हैं, वहीँ इंडियन नेशनल कांग्रेस के अवनीश काजला लड़का होकर भी “लड़की हूँ लड़ सकती हूँ” के विचार को आगे बढ़ा रहे हैं.
अब अगर हम पिछले दो चुनावों में पार्टियों की परफॉरमेंस पर नज़र डालें तो भाजपा को टक्कर सिर्फ बसपा से मिली है. 2012 में तो बड़ा करीबी मुकाबला था और भाजपा को सिर्फ 3613 वोटों से कामयाबी मिली थी. हालाँकि 2017 में यह मार्जिन बढ़कर 55899 हो गया लेकिन सामने वाली पार्टी बसपा ही थी. और पीछे जाएँ तो 2007 में बसपा ने ही भाजपा को टक्कर दी थी. इसी तरह 2002 में कांग्रेस दूसरे नंबर थी, 1996 में हाथी ही कमल के फूल के मुकाबले में था और 1993 में कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को टक्कर दी थी. कहने का मतलब यह है कि इस सीट पर भाजपा की पिछले 6 चुनावों में या तो कांग्रेस से सीधी लड़ाई हुई या फिर बहन जी की बसपा से. इसलिए अगर हम आंकड़ों में विश्वास रखते हैं तो देखते हैं कि कैंट विधानसभा के मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी या फिर रालोद को कभी भाव नहीं दिया। रालोद का भले ही पश्चिमी यूपी में भले ही कभी दबदबा रहा हो लेकिन मेरठ कैंट के मतदाताओं ने उसे हमेशा ठुकराया है.
हालाँकि किसान आंदोलन के कारण इस बार परिस्थितियों में थोड़ा बदलाव हुआ है लेकिन यह बदलाव मेरठ शहर में आया हो और उसका असर कैंट विधानसभा क्षेत्र पर पड़ रहा हो, इसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। अब अगर हवा थोड़ी उलटी चल रही हो और उसका रुख गाँव से शहर की ओर हो तो कुछ कहा नहीं जा सकता वरना आंकड़ों की भाषा में पल्ला तो इस बार भी भाजपा का ही भारी लगता है. मुकाबला किससे होगा इस बारे में लोगों की अलग अलग राय हो सकती है, लेकिन परम्परा बरक़रार रही थी तो अमित अग्रवाल को टक्कर अवनीश काजला या अमित शर्मा से ही मिलना चाहिए। यह पूरा लेख आंकड़ों पर आधारित है, इसमें लेखक की अपनी कोई राय नहीं। अब देखना है कि इस चुनाव में आंकड़े भारी पड़ते हैं या हालात।

