अमित बिश्नोई
पैग़म्बर मोहम्मद के खिलाफ भाजपा के पूर्व नेताओं नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल कि टिप्पणियों के बाद देश में उपजे तनाव और हिंसक घटनाओं पर ओवैसी की AIMIM को छोड़कर बाकी सभी मेनस्ट्रीम पार्टी पार्टियां इस मुद्दे पर सीधे तौर पर कुछ भी कहने से बचती नज़र आ रही हैं, यह पार्टियां बुलडोज़र की कार्रवाई पर तो विरोध जता रही हैं, सरकार को इनडायरेक्ट तौर पर तो घेर रही हैं मगर किसी ने भी नूपुर शर्मा या नवीन जिंदल को सीधे तौर पर नहीं घेरा है. लेकिन आज पहली बार बसपा सुप्रीमो मायावती ने देश में उपजे इस तनाव के लिए नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया है, और सिर्फ ज़िम्मेदार ही नहीं ठहराया है बल्कि उनकी फ़ौरन गिरफ़्तारी की मांग भी की है।
अब सवाल यह उठता है कि इस मुद्दे पर जब सभी राजनीतिक दलों ने चुप्पी साध रखी है तो अचानक मायावती क्यों इतना मुखर हो गयीं कि उन्होंने इस समस्या की मूल जड़ नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को ठहरा दिया। उन्हें अबतक जेल न भेजने को कानून का उपहास बता दिया और इसके अलावा न जाने क्या क्या। इस मुद्दे को उभरे हुए दो हफ्ते हो गए हैं, सवाल यह है कि मायावती अबतक क्यों चुप रहीं? बुलडोज़र की कार्रवाई तो पहले भी हुई है, तब मायावती ने इस तरह कभी सरकार को नहीं घेरा। तो क्या मायावती के इस मुद्दे पर नए तेवरों को आजमगढ़ लोकसभा के उपचुनावों से जोड़कर देखा जाय. क्या मायावती का यह बयान आज़मगढ़ में राजनीतिक नफा नुक्सान को लेकर दिया गया है?
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आपको मालूम ही होगा कि आजमगढ़ में लोकसभा का उपचुनाव 23 जून को हो रहा है और बसपा की ओर से यहाँ शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली मैदान में हैं जिनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव और भाजपा के भोजपुरी स्टार निरहुआ से है। आबादी के हिसाब से यहाँ मुसलमानों की संख्या काफी है, लगभग 16 प्रतिशत, दलित वोटर भी काफी बड़ी संख्या में है। मायावती के आज के बयान की वजह इन आंकड़ों से साफ़ तौर पर समझी जा सकती है। मायावती यहाँ पर दलित और मुस्लिम गठजोड़ का कार्ड खेलना चाह रही हैं। मुसलमान जिसने पिछले विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को भर भरकर वोट दिए, यही वजह थी कि MY समीकरण काम कर गया और सपा ने ज़िले की सभी सीटों पर जीत का परचम लहराया था, मगर चुनाव बाद मुसलमान सपा से नाराज़ नज़र आ रहा है, उसे लग रहा ही कि अखिलेश ने उसे ठगा है. पैग़म्बर मोहम्मद पर भाजपा नेताओं की टिप्पणी पर भी अखिलेश ने इन दोनों नेताओं पर ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिसकी मुसलमान उम्मीद कर रहे थे।
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ऐसे में बसपा सुप्रीमों मायावती इसे एक अवसर के रूप में लिया है और लोकसभा उपचुनाव में इसे एक राजनीतिक टूल के रूप में इस्तेमाल किया है, मायावती ने एक तरह से एक जुआ खेला है, उनके इस दांव से मुस्लिम वोटर अगर प्रभावित हो सकता है तो हिन्दू वोटर नाराज़, लेकिन मायावती यह मानकर चल रही हैं कि दलित वोट इस बार भाजपा के साथ नहीं जाएगा क्योंकि देश में सत्ताधारी दल जिस तरह की बातें कर रहा है उससे मनुवाद की झलक मिल रही और दलितों का मनुवाद से 36 का आंकड़ा है, वह नहीं चाहता कि जिन बेड़ियों से हमकों सैकड़ों साल बाद आज़ादी मिली है उन बेड़ियों में वह फिर जकड़े जायँ। अब देखने वाली बात तो यही है कि मायावती क्या वाकई नूपुर और नवीन जिंदल की गिरफ्तारी चाहती हैं या फिर चुनावी लाभ। हम तो इसे एक सियासी दांव ही मानेंगे।

