काश यूपी का बेलग़ाम कोरोना धर्म-जाति की सियासत को मार दे !

आर्टिकल/इंटरव्यूकाश यूपी का बेलग़ाम कोरोना धर्म-जाति की सियासत को मार दे !

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काश यूपी का बेलग़ाम कोरोना धर्म-जाति की सियासत को मार दे !

  • नवेद शिकोह

वर्तमान पीढ़ी ने महामारी का क़हर नहीं देखा था। पिछले वर्ष इसे यूपी वालों सहित पूरे देश ने देखा था। देखने और झेलने में फर्क होता है। पहली लहर से पचास गुना खतरनाक कोरोना के दूसरे वेब को उत्तर प्रदेश अब शिद्दत से झेल रहा है।

करीब तीन दशक से कभी धर्म तो कभी जाति के दो पालों के सियासी तमाशे में शामिल इस सूबे की जनता को पहली बार लग रहा है कि इस सियासत ने उनकी जिन्दगी को धीरे-धीरे मौत के कुएं में ढकेल दिया है। भावनाओं के फावड़े से राजनीति दल जब जनता की कब्र नुमा ये कुआं खोद रहे थे तो जनता उनकी बातों में आकर उनको जनसमर्थन की ताक़त दे रही थी। कभी यादव के नाम पर, कभी दलित के नाम पर, कभी सवर्ण तो कभी पिछड़ों के नाम पर। कभी मुस्लिम के नाम पर कभी हिन्दुत्व के नाम पर तो कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर।

आज के हालात में कोरोना ने धर्म की अफीम को नीबू चटा दिया है।नवरात्रि के दिनों में मंदिरों में भी सन्नाटा है और रमजान के महीने में मस्जिदों में भी गहमागहमी नहीं है। यादव, दलित, श्रत्रिय, ब्राह्मण, मुसलमान सब धर्म और जाति को भूल गए हैं। मंदिर और मस्जिद को लेकर भी उनकी दीवानगी कम हो गई है। सब अस्पताल में बेड ढूंढ रहे हैं। वेन्टीलेटर, आईसीयू और आक्सीजन ढूंढ रहे हैं। एंबुलेंस का इंतेजार करते-करते अपनों को खो रहे हैं। और पछता रहे है। काश! हमने मंदिर-मस्जिद के नाम पर नहीं अस्पताल के नाम पर वोट दिया होता। काश हमने हिंदु-मुस्लिम, दलित,यादव या श्रत्रिय-ब्राह्मण के नाम पर नहीं वेंटीलेटर, ऑक्सीजन और तमाम स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के वादे पर वोट दिया होता। तो आज हमारे अपनों को अस्पताल, बेड, वैंटीलेटर और समुचित इलाज मोहय्या होता, श्मशानों की वेटिंग की कतार में ख़ाक होने के लिए भी तरसना ना पड़ता।

यूपी की जनता को अब ये अहसास होने लगा है कि धर्म-जाति की राजनीति ने देश के सबसे बड़ी आबादी वाले यूपी की बुनियादी जरूरत को नजरअंदाज कर दिया। सियासतदाओं ने ये मान लिया कि जब जनता हमें कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर जिता देती है तो फिर हम अस्पताल, नौकरी, शिक्षा.. की जरुरतें क्यों पूरी करें।

कोरोना की मौत की आंधी में प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लाशों की कतारों से दहले प्रदेशवासी अब ये सोचने पर मजबूर होते नजर आ रहे हैं कि आगे की पीढ़ी को जिन्दा रहने के लिए यूपी की धर्म-जाति की सियासत के झांसे में नहीं आएंगे।

इन विचारों की आंधी यदि तेज़ हो गई तो शायद यूपी के सियासत मंदिर-मस्जिद, धर्म-जाति, हिंदू-मुस्लिम और मंडल-कमंडल से बाहर निकलकर अस्पताल, एंबुलेंस और वैंटीलेटर जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो जाए।

काश ऐसा ही हो।

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