अमित बिश्नोई
देश में जब जब चुनाव का मौसम आता है, साथ में कई मौसम भी अपने साथ लाता है, बिलकुल उसी तरह जैसे कोरोना वायरस अपने साथ नए नए वैरिएंट लेकर आया है. इनमें से सबसे खतरनाक वैरिएंट नेताओं का घर छोड़ना और और घर वापसी करना है। जैसे कोरोना महामारी एक नयी बीमारी है वैसे ही घर वापसी भी एक नया वायरस है जो नेतागीरी की दुनिया में तेज़ी से अपने पैर पसारता जा रहा है।
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ऐसा नहीं है कि पहले नेता लोग पार्टियां नहीं छोड़ते थे, बड़े बड़े नेताओं ने पार्टियां छोड़ी हैं, नई पार्टियां बनाई हैं, पार्टी नहीं चला पाए तो फिर वापस पार्टी में आये हैं लेकिन ऐसा बहुत कम होता था, इतना कम कि आप इसे बीमारी नहीं कह सकते। मगर जब से इस ‘घर वापसी’ के शब्द का ईजाद हुआ है नेताओं में घर छोड़ने की बीमारी बहुत बढ़ गयी है. हो सकता इस ‘घर वापसी’ के शब्द का इस्तेमाल राजनीती में पहले भी हुआ हो पर पिछले पांच-सात सालों में इसका चलन बहुत बढ़ गया है।
दरअसल “घर वापसी” एक ऐसा वाक्य है जिसमें बड़ी आशाएं, बड़ी उम्मीदें छुपी हुई हैं और इन्हीं आशाओं और उम्मीदों पर वह आसानी से पार्टी छोड़ने का फैसला करने लगे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि समय आने पर जब वह दोबारा पार्टी में वापस आएंगे तो उन्हें उस बेटे की तरह गले लगाया जायेगा जो घर छोड़कर चला जाता है और ठोकरें खाकर घर वापस आता है. हालाँकि नेताओं के मामले में ऐसा नहीं है। वह मलाई काटने के लिए घर छोड़ते हैं और बाहर जब मलाई काट लेते हैं तो घर वापस आकर मलाई काटते हैं. कुछ नेता इस मामले में बड़े सीज़न होते हैं, वह हर चुनावी मौसम में घर से भागते है और अगले सीज़न में घर वापसी कर लेते हैं, इतना कि उनको यह भी याद नहीं रहता कि उनका असली घर कौन सा है. ऐसे नेताओं की क़तार लम्बी है जो और लम्बी होती जा रही है, मैं यहाँ उन नेताओं के नाम नहीं ले रहा हूँ लेकिन प्रदेश के चुनावी माहौल पर अगर नज़र डालें तो साफ़ पता चल जायेगा कि सत्ता की मलाई काटकर कितने घर वापस हुए हैं।
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आप इन्हे भले ही किसी भी नाम से पुकारें. आप इन्हे दल बदलू कहें , बाग़ी कहें या थाली का बैंगन मगर यह सब अब उसी कतार में शामिल हो गए हैं जो घर छोड़ते हैं और घर वापसी करते हैं. असभ्य और अनैतिक होती जा रही राजनीति के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली लोगों की मंडली जिनकी चुनाव दर चुनाव डिमांड बढ़ती जा रही है. जो चुनाव जीतने का परसेप्शन बनाने का सबसे मज़बूत हथियार बनते जा रहे हैं. पार्टियों के लिए यह बहुत ज़रूरी हो चुके हैं , इनके लिए पार्टियां अपने उन निष्ठावान और वफादार कार्यकर्ताओं के उन सपनो की हत्या करने में नहीं चूकतीं जो अपनी पार्टी के लिए हमेशा क़ुरबानी देते रहते हैं, इस उम्मीद के साथ कि समय आने पर पार्टी उनको उनकी मेहनत का सिला देगी मगर जब समय आता है तो यह घर वापसी वाली नई जमात उनकी मेहनत पर डाका डाल देती है।
घर छोड़ने का एक ताज़ा मामला आज ही सामने आया है. कांग्रेस परिवार का एक सदस्य अपना घर छोड़कर दूसरे घर में ठिकाना बनाने पहुँच चूका है. मुझे राज परिवार के इस सदस्य से बस एक बात ही बात कहनी है कि घर छोड़ने के फैसले के पीछे हालात चाहे जैसे भी रहे हों मगर घर छोड़ दिया तो छोड़ दिया, अब घर वापसी न करना। कम से कम राज परिवार की प्रतिष्ठा का ख्याल रखना। सुना है राज परिवार के लोग बात के बहुत धनी होते हैं. जान जाय पर वचन न जाय वाले।
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बहरहाल घर छोड़ने और घर वापसी करने वालों की यह नई कौम राजनीति को दीमक की तरह खोखला कर रही है. रुकना चाहिए यह घर छोड़ने और घर वापसी का खेल. राजनीतिक पार्टियां एकबार अगर इनके घर वापसी के दरवाज़े बंद कर दें तो हमें यकीन है कि इनके घर छोड़ने का सिलसिला भी बंद हो जायेगा और यह देश की राजनीति के लिए भी सही होगा और राजनीतिक पार्टियों के लिए भी।

