बिजनौर। चुनाव आयोग द्वारा चुनावों की घोषणा करने के काफी पहले से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई थी। 1 वर्ष से अधिक चले किसान आंदोलन तथा टिकैत के बयानों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में सियासी पारा लगातार चढ़ाए रखा है। पिछले चुनावों में यहां से भारतीय जनता पार्टी को बंपर वोट मिले थे। जाटलैंड कहलाए जाने वाली इस बेल्ट में भाजपा ने अन्य दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था। लेकिन अब बदलती परिस्थितियों में मतदाताओं के मूड की थाह लेना राजनीतिक विशेष लोगों के लिए भी टेढ़ी खीर है। सभी राजनीतिक दलों के अपने दावे हैं लेकिन इन सब दावों के बीच मतदाता अपना अलग ही मन बनाए बैठे हैं।
पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश में मतदाताओं ने किसी एक पार्टी/गठबंधन को बहुमत दिया है।गौरतलब है कि 403 विधानसभा सीटों वाले इस राजनीतिक रूप से जटिल प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने के लिए 202 सीटें जीतना ज़रूरी है।
साल 2007 में मायावती को 206 सीटों पर जीत हासिल हुई। 2012 में समाजवादी पार्टी को 224 सीटों के साथ बहुमत हासिल की हुआ और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। मुजफ्फरनगर में हुए दंगे के बाद बदले हालात में 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में 312 सीटों के साथ योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बने।
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लेकिन इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सत्ता की राह आसान नहीं है। किसान आंदोलन के कारण पश्चिम उत्तर प्रदेश मैं राजनीतिक समीकरण बदले नजर आ रहे हैं। इसका फायदा कहीं ना कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समाज में अपनी अच्छी पकड़ रखने वाले राष्ट्रीय लोक दल को मिल सकता है। गौरतलब है कि साल 2014 और 2017 के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की धमक का सबसे ज़्यादा राजनीतिक नुकसान राष्ट्रीय लोकदल को ही उठाना पड़ा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल को मात्र एक सीट हासिल हुई थी। हालांकि बाद में उसे इस सीट से भी हाथ धोना पड़ा था।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश इन दिनों किसान आंदोलन की वजह से सुर्ख़ियो में है। जिसके कारण कुछ जानकारों का मानना है कि बीजेपी को आने वाले चुनाव में किसानों की नाराजगी भारी पड़ सकती है। लेकिन कुछ दिनों पहले हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जिस तरह से नए कृषि क़ानून को लेकर मोदी सरकार ने ख़ुद की पीठ थपथपाई है, उसे देख कर लग रहा है कि बीजेपी आश्वस्त है कि किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें चुनाव में नुक़सान नहीं हो रहा है। हाल ही में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैराना पहुँचे और ‘पलायन’ की बात दोहराई, उससे तस्वीर और साफ़ हो गई कि भाजपा किन मुद्दों को लेकर आगे बढ़ेगी।
सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज के आंकड़ों के मुताबिक़, 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में 41 फ़ीसदी वोट मिले थे, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में औसत से ज़्यादा 43-44 फ़ीसदी वोट मिले। उत्तर प्रदेश में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे, पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाक़े में बीजेपी को 52 फ़ीसदी वोट मिले थे। भाजपा थिंक टैंक पर इस निरंतर बढ़ते वोट प्रतिशत को बरकरार रखने की चुनौती है। लेकिन इस बार बीजेपी ‘किसानों की नाराज़गी’ को ‘पलायन’ और ‘हिंदू-मुसलमान’ जैसे मुद्दों से कितना साध पाएगी यह 10 मार्च को ही पता चल सकेगा।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से लेकर मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर और बिजनौर आदि इलाकों में राष्ट्रीय लोकदल का अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है। दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बड़ा फैक्टर है। अपने पिता चौधरी अजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात पहली बार चुनावों में पार्टी की कमान थाम रहे जयंत चौधरी एक मंझे हुए नेता की तरह बयान दे रहे हैं लेकिन जयंत की रणनीति जाट वोट को अपने कब्जे में करने की है। हालांकि केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता संजीव बालियान मुज़फ्फरनगर में 2017 वाली जीत दोहराने का दावा कर रहे हैं।
इस बार किसान आंदोलन के बाद बदली फिजा का रुख भांपते हुए जयंत चौधरी ने सपा के साथ गठबंधन कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निर्णायक जाट व मुस्लिम मतदाताओं को साधने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2014 (लोकसभा चुनाव ) , 2017 विधानसभा चुनाव और 2019 लोकसभा के चुनाव में जाट वोट एकमुश्त बीजेपी के पक्ष में पड़ा और पश्चिमी यूपी में बीजेपी ने सभी राजनीतिक दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था; लेकिन इस बार 2022 के विधानसभा चुनाव में स्थिति कुछ अलग है। कृषि बिल के खिलाफ आंदोलन के बाद जाटों में भाजपा के खिलाफ नाराजगी है और चुनावों में भी उस नाराजगी का असर दिख सकता है। साथ ही सपा और रालोद का गठबंधन भी बीजेपी को परेशानी में डाल सकता है।
जातीय समीकरणों की बात करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 27 फीसदी मुस्लिम हैं। 17 फीसदी जाट हैं। दलितों की संख्या 25 फीसदी है। गुर्जर करीब 4 फीसदी हैं और राजपूत 8 फीसदी हैं।
समाजवादी पार्टी 2017 के चुनावों में हार के बाद से ही लगातार प्रदेश की भाजपा सरकार पर हमलावर रही है। समय-समय पर अखिलेश यादव आगे बढ़कर योगी सरकार के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं। पिछले कुछ समय में समाजवादी पार्टी ने प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने तथा भाजपाई नीतियों से नाराज मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने जाट वोट बैंक की अहमियत को देखते हुए राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन कर जाट मुस्लिम यादव समीकरण को मजबूत करने का प्रयास किया है।
टिकट बंटवारे में बिजनौर सहित कुछ सीटों पर गठबंधन में समस्या देखने को अवश्य मिली है लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि यह स्थानीय नेताओं के आपसी सामंजस्य की कमी के कारण हुआ है। जिसके समाधान के लिए दोनों पार्टियों ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। अखिलेश यादव को शायद पहले से मालूम था कि उनके टिकट बंटवारे पर सवाल उठेंगे और हो सकता है इसीलिए इस विवाद से अलग समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन ने एक अलग समीकरण बनाने की कोशिश भी की है। मुजफ्फरनगर जिले में 6 सीटों में से 5 पर किसी भी मुस्लिम को गठबंधन से उम्मीदवार नहीं बनाया गया है।
पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन तथा सपा गठबंधन के आगे बहुजन समाज पार्टी तथा अन्य दलों की कोई धमक नहीं दिखाई दे रही है। 2012 तथा 2017 के चुनावों में जिस मजबूती तथा जोर-शोर के साथ बहुजन समाज पार्टी चुनावी रण क्षेत्र में उतरी थी उसे देखते हुए आज की बसपा कांति हीन नजर आती है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है तथा वह किसी भी चुनाव में अपने बूते उलटफेर करने में भी सक्षम है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय नेता के रूप में उभरे चंद्रशेखर रावण ने बहुजन समाज पार्टी के परंपरागत वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया है। हालांकि कुछ चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा और सपा की नीतियों से नाराज़ मतदाता बसपा का रुख कर सकते हैं वहीं बसपा द्वारा घोषित कई उम्मीदवार अपने बूते भी राजनीतिक उलटफेर करने में सक्षम है। इसके बावजूद माया के हाथी की चाल फिलहाल पश्चिम उत्तर प्रदेश में सुस्त नजर आ रही है।
गौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 26 जिले आते हैं जहां विधानसभा की 136 सीटें हैं। पहले चरण में 10 फरवरी को 11 जिलों की 58 और दूसरे चरण में 14 फरवरी को 9 जिलों में 55 सीटों पर वोटिंग होनी है। बाकी के जो 6 जिले हैं उनमें तीसरे चरण में चुनाव होने हैं।
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जातीय समीकरण से साफ नजर आ रहा है कि अगर जाट वोट भाजपा से छिटका तो सपा और रालोद गठबंधन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि बसपा के कमजोर होने से मुसलमानों का भी अधिक संख्या में रुझान अब समाजवादी पार्टी की तरफ ही है। उत्तर प्रदेश में चुनाव की शुरुआत भी पश्चिमी यूपी से ही हो रही है। फिलहाल तीनों प्रमुख खेमों के अपने दावे हैं। जिन को हकीकत में बदलने के लिए सभी दल अपना जोर लगाए हुए हैं।

