अमित बिश्नोई
कल कश्मीर से एक खबर आयी. वैसे तो आप इसे विघटनकारी तत्वों द्वारा एक साधारण हरकत कह सकते हैं लेकिन देश में फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’के बाद चल रहे विवाद के बीच यह खबर काफी खतरनाक हो जाती है। खबर है कि कश्मीर के कुलगाम में एक विघटनकारी संगठन ने कुछ जगहों पर पोस्टर चिपकाये हैं जिनमे कश्मीर में रह रहे पंडितों को एकबार फिर वार्निंग दी गयी है कि वह घाटी को फ़ौरन खाली कर दें। इस खबर से ज़हन एकदम से फ़्लैश बैक में चला गया और याद आने लगीं 1990 की वह घटनाएं जब ऐसा ही कुछ हुआ था और मानवता को शर्मसार करने वाली त्रासदी हुई थी जिसकी पीड़ा आजतक लाखों कश्मीरी पंडित झेल रहे हैं।
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लश्करे इस्लाम नाम के किसी आतंकी संगठन की तरफ से जारी हुए इन पोस्टरों में साफ़ तौर पर धमकी दी गयी है कि काफिरों खबरदार! कश्मीर छोड़ने की यह अंतिम चेतावनी है. एक के बाद एक तुमको मारकर तुम्हें जहन्नुम भेजा जायेगा। पोस्टर में कहा गया है कि तुम्हें न मोदी बचा सकते हैं और न अमित शाह. 1990 में हमारे लोगों ने जो शुरुआत की थी उसे अब हम आगे बढ़ाने आये हैं। लश्करे इस्लाम के कमांडर की ओर से जारी इस पोस्टर में कश्मीर के उन मुसलमानों को भी अंजाम भुगतने के लिए कहा गया है जो कश्मीरी पंडितों का समर्थन करेंगे।
पोस्टर में इस्तेमाल की गयी भाषा बेहद नफरत भरी है, यक़ीनन यह किसी कश्मीरी की तो नहीं हो सकती, कश्मीर तो मोहब्बत की वादी का नाम है. 1989 से पहले तो वहां किसी की हत्या भी एक बहुत बड़ी खबर होती थी मगर 90 तक आते आते बहुत कुछ बदल गया. सैकड़ों कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतारा गया, लाखों को पलायन करना पड़ा और आज 32 साल बाद फिर उसी तरह के पोस्टर मिलना बहुत बड़ी चिंता की बात है।
दावे किये जा रहे हैं कि कश्मीर के हालात अब बदल चुके हैं, वहां भी विकास की नदिया बहने लगी है, रोज़गार का सृजन होने लगा है, नौजवान मुख्य धारा में लौट आया है, आर्टिकल 370 हटाकर सरकार सबको बराबरी का अधिकार देने के दावे कर रही है, अब कश्मीर सिर्फ कश्मीरियों का नहीं, देश के हर नागरिक का हो चूका है, कोई भी वहां जाकर ज़मीन खरीद सकता है, व्यापार कर सकता है लेकिन जब अख़बार के पन्नों पर नज़र डालें तो कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब कोई बेगुनाह न मारा जाता हो। वह स्थानीय भी हो सकता है और गैर स्थानीय भी, वह हिन्दू भी हो सकता है और कश्मीरी मुसलमान भी. कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ न होती हो. आतंकी मारे जाते हैं मगर जवानों की भी शहादत होती है।
हत्याओं का और शहादतों का सिलिसिला जारी है और साथ ही राजनीति भी. कब बंद होगा यह सिलसिला, कब ख़त्म होगा यह खूनी खेल, कब थमेगी नफरत की रफ़्तार। पडोसी पाकिस्तान में सरकार बदली, खान के बदले शरीफ आये और आते ही उनकी शराफत का नमूना भी सामने आ गया. सवाल यह है कि शाहबाज़ भारत के लिए कितने शरीफ होंगे। कश्मीर में इस तरह के नफरती पोस्टर लगें और पाकिस्तानी आकाओं को खबर न हो, ऐसा असंभव है। दुनिया जानती है कि भारत को तोड़ने की हर हरकत के पीछे पाक फ़ौज और सरकार का हाथ होता है. याद रखिये पाकिस्तान की नई सरकार ने सत्ता संभालते है सबसे पहले कश्मीर का राग अलापा है।
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भारत सरकार इसे सिर्फ महज़ एक पोस्टर न समझे। यह किसी बड़ी साज़िश की शुरुआत भी हो सकती है, 90 को दोहराने का षणयंत्र भी। आतंकियों की इस हरकत का जितनी जल्दी पटापेक्ष हो भारत और कश्मीर दोनों के लिए बड़ा अच्छा होगा। सिर्फ दावों से काम नहीं चलने वाला, कश्मीर को फिर से जन्नत बनाने की बात कही है तो उसे बनाइये, 32 साल बाद नफरती पोस्टर की वापसी अच्छा शगुन नहीं।

