अमित बिश्नोई
कर्नाटक इन दिनों विवादित मुद्दों का अखाड़ा बना हुआ है, पहले हिजाब, फिर मंदिरों में आयोजित मेलों में मुस्लिम समुदाय की दुकानों पर पाबन्दी और अब हलाल मीट. चूंकि इस दक्षिण राज्य में चुनाव भी होने वाले हैं इसलिए इन सारे मामलों को सीधे रूप से राजनीति से जोड़ा जा रहा है. एक तो कर्नाटक में भाजपा का राज है दूसरे इन तीनों मामलों में दक्षिणपंथी संगठनों का सीधे तौर पर शामिल होना मामलों को साम्प्रदायिक रंग दे रहा है जो आजकल चुनावी राजनीति का सबसे सफल और कारगर हथियार है.
Read also: एसडीपीआई हलाल मीट बैन के खिलाफ कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन करेगी
लेकिन इन तीनों मामलों को अगर गौर से देखें तो किसी एक धड़े को पूरे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, मामले को तूल देने में दक्षिणपंथियों के साथ सामने वाली पार्टियां भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदार हैं. अगर हिजाब की बात करें तो यह एक स्कूल का मामला था, जिसमें कुछ लड़कियों को हिजाब पहनकर स्कूल कक्षाओं में आने से मना किया गया था. यह एक सिंपल ड्रेस कोड का मामला था. स्कूल की नीयत कुछ भी हो पर बात जब ड्रेस कोड की आती है तो उस नियम को लागू करने या करवाने में कोई हर्ज नहीं था. उन 6 छात्राओं और उनके माँ बाप की ज़िद ने दक्षिणपंथियों को यह मौका दिया कि वह इसपर राजनीति करें, उनके साथ तथाकथित सेक्युलर और कुछ इस्लामिक संगठनों ने इसे इस्लाम से सीधा जोड़ दिया। बात तो बिगड़नी ही थी, बिगड़ी भी. मामला अदालत तक गया, लोगों को फैसला मालूम था, हाईकोर्ट ने फैसला भी अपेक्षा के अनुसार ही सुनाया और अब लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गयी है.
हिजाब से उपजे विवाद ने राज्य में दक्षिणपंथियों और उग्र होने का मौका दिया। बात मंदिरों में बरसों से लग रहे मेलों तक पहुँच गयी, दबाव डाला गया कि इन मेलों में मुस्लिम दुकानदारों को अब दुकाने नहीं लगाने दिया जायेगा। मंदिर प्रशासन को भी न चाहते हुए ऐसे आदेश देने पड़े. मुस्लिम दुकानदारों पर यह सीधा आर्थिक हमला था, कोरोना से टूटे हुए इन दुकानदारों के लिए यह प्रतिबन्ध पहाड़ टूटने से कम नहीं था क्योंकि यह मेले ही उनकी आजीविका का मुख्य स्त्रोत थे , यह लोग बरसों से इन मेलों में दुकानें लगा रहे थे. हालाँकि सरकार की ओर से ऐसा कोई आदेश नहीं था लेकिन ऐसी घटनाओं पर कोई सकारात्मक कार्रवाई भी नहीं हुई. हिजाब से उठे विवाद पर यह पहली प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई थी.
Read also: कर्नाटक एसएसएलसी परीक्षा : हिजाब पहने निरीक्षक निलंबित
और अब मामला हलाल मीट (Karnataka Halal Meat Controversy) पर आ गया. दक्षिणपंथी संगठनों और कुछ सत्ताधारी नेताओं की ओर फरमान जारी हुआ कि कोई भी हिन्दू हलाल मांस का उपयोग नहीं करेगा क्योंकि इसके उपयोग से पहले यह अल्लाह को चढ़ाया होता है इसलिए यह हिन्दुओं की आस्था को ठेस पहुंचाता है. दरअसल कर्नाटक में कई मंदिरों में देवी देवताओं को मांस चढ़ाया जाता है, इसलिए इन संगठनों का कहना है कि हलाल की प्रक्रिया में यह पहले किसी को भेंट किया जा चूका होता है इसलिए यह देवी देवताओं को नहीं चढ़ाया जा सकता। तार्किक आधार पर बात सही भी है. हलाल की प्रक्रिया इस्लाम और यहूदी धर्म का ज़रूरी हिस्सा है, मुसलमानो की तरह यहूदियों में भी सिर्फ हलाल चीज़ का ही इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन हिन्दू धर्म में यह लागू नहीं होता, हिन्दू धर्म में बलि भी एक झटके में दी जाती है जबकि मुसलमानों में जानवरों का गला रेता जाता है और दुआ पढ़ी जाती है और जब तक उस जानवर के जिस्म से पूरा खून नहीं निकल जाता उसका उपयोग हराम है.
Read also: कर्नाटक में अब हलाल बनाम झटका पर ठनी
आप सीधे तौर पर देखेंगे तो हिन्दुओं से हलाल मीट का इस्तेमाल मना करना कोई ग़लत बात नहीं। आप इस अपील की टाइमिंग पर सवाल उठा सकते हैं, आप इसपर भी सवाल उठा सकते हैं कि यह सारे मामले उठाकर अल्पसंख्यकों को परेशान किया जा रहा है, आप यह भी कह सकते हैं कि देश को आज़ाद हुए इतने साल हो गए, आज तक तो ऐसा नहीं हुआ लेकिन आजतक ऐसा भी तो नहीं हुआ कि किसी स्कूल में हिजाब पहनने के लिए किसी ने ज़िद पकड़ी हो. मेरी नज़र में तो यह क्रिया की एक प्रतिक्रिया है जो अति की ओर बढ़ रही है. ऐसा होना किसी भी देश या राज्य के लिए ठीक नहीं होता। वहां का सामाजिक ताना बाना छिन्न भिन्न होता है लेकिन देश में 365 दिनों के चुनावी माहौल में इस तरह की बातें अब साधारण सी बात है. इस समय 80 बनाम 20 का फार्मूला बिक रहा है, कर्नाटक की इन घटनाओं को भी 20 बनाम 80 की प्रतिक्रिया ही मानिये। 20 प्रतिशत ने एक हिजाब का मुद्दा उठाया, 80 प्रतिशत अब उसी रेशियो से उसका जवाब दे रहा है.

