- नवेद शिकोह

दुश्मन को अभी पूरी तरह हम पहचान ही नहीं पाए हैं। पत्रकार, चित्रकार, कलाकार, कलमकार या कोई भी आम-ख़ास इंसान तो दूर वैज्ञानिक/चिकित्सक भी अभी इसकी जानलेवा चालों से पूरी तरह वाक़िफ नहीं हुए हैं। रिसर्च चल रहे हैं, आशा है भविष्य में कोई सुखद परिणाम आएगा। हो सकता है टीकाकरण अभियान मुकम्मल होने के बाद मौत का तांडव थमें और देश को जीवनदान मिले।
फिलहाल कयास ही लगाए जा रहे हैं। रिसर्च हो रहे हैं। ये अच्छी बात है कि कोरोना पेशेंट ठीक भी हो रहे हैं। लेकिन मौतों की आंधी भी तेज़ हो रही है। ये आंधी कुछ इशारे कर रही है। हमने पहले छूने, स्पर्श, छीकने-खासने में एहतियात की। मास्क और सामाजिक दूरी को कोरोना वायरस के ख़िलाफ हथियार बनाया। बाबा रामदेव के कोरोनिल, आर्युवेदिक, होम्योपैथिक और घरेलू नुख्सों का भी सहारा लिया। इसका लाभ भी हुआ। पर कोरोना की दूसरी लहर जबरदस्त तरीके से जिन्दगियां लील रही है।
वैज्ञानिकों ने शंका जाहिर की कि ये वायरस हवा में है। ये ख्याल इसलिए भी सही लगने लगा क्योंकि वो लोग भी इस मनहूस संक्रमण के शिकार हुए जिन्होंने गाइड लाइन का मुश्तैदी से पालन किया था।
देश को कोरोनो से एहतियात की हिदायत देने वाले सदी के नायक पिछली लहर में संक्रमित हुए थे। मालूम हो कि बिग बी ने कोरोना काल में भी खूब शूटिंग की थी। गृह मंत्री, देश के तमाम मुख्यमंत्री, मंत्री और नौकरशाहों सहित तमाम वीवीआइपी हस्तियां वायरस की चपेट में आईं थी।
अब अंदाजा ये लगाया जा रहा है कि वो खास और आम लोग जिन्होंने तमाम एहतियातों के बाद भी भीड़ से रिश्ता जोड़ा उनमें से अधिकांश लोग कोरोना का शिकार हुए। यानी भीड़ की हवा में कोरोना निश्चित तौर पर मौजूद होता है। और भीड़ में आप जितनी भी एहतियात करें वहां की हवा से आप दूरी नहीं बना सकते हैं।
मेरा खुद का अनुभव है। जनवरी तक कोरोना का कहर थमा हुआ था। फरवरी में हम लखनऊ के पत्रकारों को उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति का चुनाव कराने का कीड़ा काटा। करीब डेढ़ महीने तक नौ सौ पत्रकारों की सहभागिता वाली चुनावी गतिविधियों की भीड़ परवान चढ़ी। मीटिंगें हुईं। भीड़भाड़ में प्रचार हुआ। सदस्यता शुल्क का अभियान चला। परचा भरना, नाम वापसी, चुनाव और फिर मतगणना में सब खूब थके। चुनाव बाद पत्रकारों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया। चुनाव में जीतने वाले दो पत्रकार जिन्दगी से हार गए। एक और प्रत्याशी की मृत्यु हुई। अन्य और भी मुख्यालय पत्रकारों की मौत हुई। दर्जनों संक्रमित हुए।
भीड़ के खतरों को महसूस करते हुए उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति को एक रिसर्च पेपर मान लीजिए। अब आप यूपी के पंचायत चुनावों और पश्चिम बंगाल इत्यादि चुनावों पर ग़ौर फरमाइये। चुनाव का पर्याय होती है भीड़। इन चुनावों के भी दुखद परिणाम आ रहे हैं।
पंचायत चुनाव की ड्यूटी पर लगे सैकड़ों कर्मचारियों की मौत की खबरे आ रही हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल जो भीड़ और रैलियों की भव्यता के कारण काफी चर्चा मे रहा यहां के कुछ उम्मीदवारों की मौत हो गई। बंगाल में संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है। इन चुनावों की पड़ताड़ के लिए देश के ब्रांड न्यूज चैनलों के मुख्यालयों से सैकड़ों पत्रकार लम्बें समय तक पश्चिम बंगाल की भीड़ भरी रैलियों में शरीक हुए। बीते बृहस्पतिवार रात जब पांच राज्यों का एक्जिट पोल चैनलों पर दिखाया गया तो जी न्यूज के डीएनए कार्यक्रम को पेश करते हुए टीवी पत्रकार सुधीर चौधरी ने बताया कि नोएडा स्थित उनके मुख्यालय से पत्रकारों और टेक्निकल स्टाफ की एक टीम सौ दिन तक चुनावी फिज़ा को परखने के लिए लगाई गई थी।
इसके अलावा यहां तमाम बड़े चैनलों ने कई चर्चित लाइव डिबेट/शो किए। इसी तरह देश के कोने-कोने से बड़े-बड़े मीडिया घरानों के पत्रकारों का हुजूम चुनावी रैलियां कवर करता रहा। इन तमाम चुनावों के बाद पत्रकारों के संक्रमित होने और मरने का ग्राफ तेज़ हो गया।
एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल केवल अप्रैल महीने में 52 पत्रकारों की जान गई है। रिपोर्ट के अनुसार1 अप्रैल 2020 से 28 अप्रैल 2021 के बीच कोविड-19 के कारण 101 पत्रकारों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 19 पत्रकारों की मौत हुई है। इसके बाद तेलंगाना में 17 और महाराष्ट्र में 13 पत्रकारों ने अपनी जान गवाई है। ताज़ा ताज़ा मामला आजतक चैनल के एंकर रोहित सरदाना का है जिनकी मौत भी कोरोना संक्रमण के कारण हुई.
कोरोना क्या है, किस तरह हमला करता है, इसका व्यवहार क्या है, ये कैसे अपना रूप और व्यवहार बदलता है, इसकी कितनी किस्में हैं ? इस पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिक इन सवालों का जवाब अभी मुकम्मल तौर पर देने की स्थिति मे नहीं हैं। लेकिन अभी तक के अनुभव यही बता रहे हैं कि कोरोना को सबसे बड़ी ताकत भीड़ से मिलती है और कयास लगाया जा सकता है कि भीड़ की हवा में ये अपना असर दिखाता है। इत्तेफाक कि फर्स्ट वेव में धार्मिक आयोजनों और अन्य भीड़ के मौकों पर तो किसी हद तक नकेल कस ली गई पर भीड़ का पर्याय चुनाव नहीं रुके। राज्यों में विधानसभा चुनाव हों, पंचायत चुनाव हों या लखनऊ में अदना से पत्रकारों के चुनाव हों। इन लोकतांत्रिक उत्सहों से पत्रकारों का सीधा रिश्ता रहा। और पत्रकारों ने इसमें खूब भागीदारी निभाई और अफसोस कि चुनावों की भीड़ (मॉब) मॉब लीचिंग बनकर पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित होने लगी।

