सुनील शर्मा
जैसे-जैसे चुनाव पास आ रहा था, राजनीतिक हलचल बढ़ती ही जा रही थी। नेताओं के पाला बदलने का सिलसिला शुरू हुआ तो दुश्मन अपने दोस्तों से भी प्यारा लगने लगा। बदलते राजनीतिक हालात की नब्ज टटोलने के लिये शर्माजी ने भी अपना झोला उठाया और पहुंच गये चौधरी साहेब के पास जो हाल ही में अपने हैंडपंप के पानी से कमल खिलाने की सोच कर चलती साइकिल से कूद गये थे।
शर्माजी सोच कर गये थे की चौधरी साहेब के यहां जश्न का माहौल होगा, दो विरोधी पार्टी के लोग गले मिल रहे होंगे, जलेबी-कचौड़ी का दौर चल रहा होगा, लेकिन यहां तो हालात ही दूसरे थे। पार्टी कार्यालय में हैंडपंप तो खड़ा था मगर कमल अपनी बारी के इंतजार में एक कोने में पड़े थे। हालात को समझने का प्रयास करते हुए शर्माजी ने चौधरी साहेब से मुकालात की तो उनकी पेशानी पर बल पड़े हुए थे। बड़ी मुश्किल से बात करने के राजी हुए तो शर्माजी ने पूछा, चौधरी साहेब आप जो चलती साइकिल से कूदे तो आपको कहीं चोट तो नहीं आयी। आपका हैंडपंप तो सही है न, आपके समर्थन से कमल इस बार और खिलेगा न?
शर्माजी का सवाल सुनकर चौधरी साहेब के मन में समाया दुखः फूट पड़ा और वो बोले, शर्माजी आपसे क्या छिपा है, साइकिल पर सवार होकर देश भर की यात्रा करने की सोची थी। सोचा था जहां भी खाली जमीन दिखेगी वहीं अपना हैंडपंप गाढ़ देंगे। मगर साइकिल की रफ्तार तेज निकली और मेरा हैंडपंप भारी। साइकिल वालों ने कहा, जहां गड़े हो वहीं जमे रहो। अब शर्माजी आप ही बताओ मेरे हैंडपंप में क्या पानी नहीं है। पिछली बार भी कह-सुनकर गिनती के विधायक जीते थे। उनमें से भी कुछ नेताओं ने भले ही अपने हाथ में हैंडपंप थामें थे मगर उनके सिर पर टोपी लाल ही थी। वो पानी हमारे हैंडपंप का पीते थे मगर बात लाल टोपी वाले की ही करते थे। जैसे-तैसे समय गुजारा और इंडिया की राह देखते रहे। मगर इंडिया में बिछड़े सभी बारी-बारी की नौबत आते देर नहीं लगी। इंडिया से आई निकल-निकल कर भागे तो सिर्फ एनडीए ही बचा दिखाई दे रहा था। अब इनके सहारे रहता तो इस बार मेरा हरा रंग भी लाल ही हो जाता। ऊपर से भारत के रत्न का बोझ इतना था की कमल लेकर आये नेताजी को मना करता भी तो कैसे।
हालात को समझने का प्रयास करते हुए शर्माजी ने पूछा, अब तो आपका हैंडपंप, कमल खिलाने को तैयार है। आपकी राहें आसान और मंजिल नजदीक है न? शर्माजी का सवाल सुनते ही चौ0 साहेब के मन का गुबार फूट पड़ा। भारी गले से बोले, शर्माजी मेरे साथ तो सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली बात हो गयी। सोचा था की हैंडपंप चलेगा तो कमल खिलेगा, अरसे से बनी सत्ता से दूरी खत्म होगी। मगर यह सपना पूरा होना शुरू भी नहीं हुआ था की किसानों ने दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। पिछली बार के किसान आंदोलन में हमने ही सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कही थी। खूब खरी-खोटी सुनाई थी सरकार को, किसना भाइयों के साथ खड़े होकर सरकार का विरोध किया था। लेकिन इस बार करें भी तो क्या करें, कहां जायें, किसके साथ जायें? हम तो खुद सरकार के साथ हो गये हैं। अब सरकार के खिलाफ जाते हैं तो कमल हाथ से छूट जायेगा और सरकार के साथ रहेंगे तो किसान भाइयों का साथ रह जायेगा।
हालात की गंभीरता को समझ चुके शर्माजी ने कहा, लेकिन चौधरी साहेब, अब तो आप भी लगभग सरकार में ही हैं। आपकी बात तो सुनी ही जायेगी। आप ही किसानों की मांग पूरी करवा दो। यह सुनते ही चौधरी साहेब का पारा हाई हो गया और वो वोले, क्या बात करते हैं शर्माजी, सरकार भला किसी की सुनने वाली है। यदि सरकार सुनती ही होती तो पिछला किसान आंदोलन इतना लंबा चलता क्या? यदि सरकार ने किसानों की सुनी ही होती तो किसानों को फिर से दिल्ली पर चढ़ाई करनी पड़ती क्या? अरे शर्माजी, किसी सरकार ने जनता की कभी सुनी है जो यह सरकार सुनेगी। हमें तो परेशानी यह है की अगर किसान भाईयों ने हमारी नहीं सुनी तो हम अपनी किसको सुनाएंगे। कमल हाथ में ले तो लिया है मगर हैंडपंप पर चढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही। अब तो डर यह है की कमल का बोझ हैंडपंप उठा भी पायेगा की नहीं, कहीं ऐसा न हो की हैंडपंप अपनी जगह पर ही धंस जाये और कमल ही कमल रह जाये। अब तो साइकिल वाले भी सवारी नहीं करायेंगे और हाथ का साथ तो हमें मिलने से रहा। हमारे तो इधर कुंआ, उधर खाई है। अब शर्माजी आप ही बताओ की हम जाये ंतो कहां जायें…
अब इस सवाल का जवाब तो शर्माजी के पास भी नहीं था, तो उन्होंने उठ कर चलना ही बेहतर समझा, जाते-जाते उनके होठों पर एक गाना अनायस ही आ गया, वक्त ने किया क्या हसीं सितम…

