ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को लेकर जमीअत उल्माए हिन्द ने आज कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में दाखिल उन सभी याचिकाओं का विरोध करेगी जिसमें प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट को चैलेन्ज किया गया गया है. जमीअत ने कहा कि वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट में प्लेसेस ऑफ़ वरशिप कानून को ख़त्म करने की मांग करने वाली दो याचिकाएं दाखिल की गयी थीं जिसमें एक याचिका की सुनवाई के स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया गया है. यह याचिका बीजेपी से सम्बन्ध रखने वाले अधिवक्ता अश्वनी उपाध्याय ने दाखिल की थी.
Also Read : पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी पड़ी भारी, Nupur Sharma भाजपा से निलंबित
जमीअत ने कहा है कि इस याचिका के विरोध में एक याचिका शीर्ष अदालत में दाखिल कर दी गयी है. इस सम्बन्ध में जमीअत उल्माए हिन्द कानूनी सेल के प्रमुख गुलज़ार आज़मी ने कहा कि प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट 1991 में पास किया गया था जिसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद होने के समय धर्म स्थलों की जो स्थिति थी उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता है, केवल बाबरी मस्जिद विवाद को इस कानून से बाहर रख गया था क्योंकि ये मामला पहले चल रहा था.
Also Read : Kanpur Violence : यूपी STF के हत्थे चढ़ा कानपूर हिंसा का मास्टरमाइंड हयात जफर हाशमी
इस विरोध याचिका में कहा गया है कि अयोध्या विवाद मुक़दमे में जमीअत उल्माए हिन्द एक पक्षकार थी जिसमें प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट की दफा 4 को स्वीकार किया गया है और इस कानून की संवैधानिक हैसियत को भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया, इसलिए इस कानून को चैलेन्ज करके देश के माहौल को एकबार फिर खराब करने की कोशिश की जा रही है. याचिका में यह भी कहा गया है कि 1991 का कानून लागू करने के दो उद्देश्य थे , पहला यह था कि किसी भी धर्म स्थल की तब्दीली को रोकना और दूसरा उद्देश्य यह था कि 1947 के समय की इबादगाहें जिस हाल में थीं उसी हाल में रहने देना और इन दोनों उद्देश्यों को अयोध्या विवाद के फैसले में अदालत ने माना है.
