लखनऊ: क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का आकार इंग्लैंड से दोगुना और आबादी के हिसाब से दुनिया में छठा स्थान है। इस बड़े और राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के आगामी 2022 विधान सभा चुनाव भी खासा दिलचस्प होने वाले हैं। जिसके लिए राजनैतिक सरगर्मी बढ़ चुकी है। जानकारों के मुताबिक सूबे में मुक़ाबला केवल दो पार्टियों सपा और भाजपा के नेता अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच होने वाला है।
हालांकि वर्तमान में सीएम योगी की छवि एक प्रखर राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी नेता की रही है, लेकिन दो दशकों तक सांसद होने के अपने अनुभव का प्रयोग कर योगी आदित्यनाथ ने अपनी छवि एक विकासवादी नेता के रूप में भी पेश करने की कोशिश की है। इसके निम्नलिखित कारण भी है। अगर यूपी में एक्सप्रेसवे निर्माण को एक अखिलेश और योगी के बीच एक मानक उदाहरण के रुप में ले तो, देखेंगे कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सूबे में करीब 165 किलोमीटर लंबे ग्रेटर नोएडा-आगरा एक्सप्रेसवे का निर्माण कराया। वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) ने 302 किलोमीटर लंबे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का निर्माण किया। विगत 15 वर्षों के बसपा-सपा शासन में, प्रदेश के लोगों को केवल पश्चिमी यूपी तक सीमित 467 किमी एक्सप्रेसवे मिले।
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इसके विपरीत योगी आदित्यनाथ ने एक्सप्रेस-वे को इससे कई गुना ज्यादा आगे बढ़ाने का काम किया है। नवंबर 2021 में जब पीएम मोदी ने 341 किलोमीटर लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया, तो अब तक उपेक्षित पूर्वी यूपी के नौ जिले, दिल्ली और लखनऊ से एक बार में जुड़ गए। वहीं सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र के सात जिलों को जोड़ने वाले 300 किमी लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का मुख्य कैरिजवे भी जनवरी 2022 तक चालू होने की संभावना है। बतादे कि, इन दो बड़ी ग्रीन-फील्ड परियोजनाओं के द्वारा योगी सरकार ने राज्य में एक्सप्रेसवे नेटवर्क और सड़क के बुनियादी ढांचे में 641 किमी का विस्तार किया है।
यही नहीं योगी सरकार ने 600 किमी गंगा एक्सप्रेसवे और 91 किमी लंबे गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे के साथ, यूपी को देश में उच्च गुणवत्ता वाले सड़क नेटवर्क और एक्सप्रेसवे की एक अलग श्रेणी में पहुंचा दिया है। गंगा एक्सप्रेस-वे के लिए लगभग 98 प्रतिशत भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है और बोली प्रक्रिया जारी है। गंगा एक्सप्रेसवे राज्य के पश्चिमी क्षेत्र को पूर्वी से जोड़ेगा और 12 जिलों से होकर गुजरेगा।
गौरतलब है कि, केवल सड़क ही नहीं रोजगार पे भी सरकार का ध्यान रहा है। यह सीएम योगी के प्रयासों का ही नतीजा है कि 31 वर्ष के बाद गोरखपुर खाद कारखाना आज दुबारा शुरू हो रहा है जिससे पूर्वांचल और इससे सटे इलाके के किसानों को फायदा मिलने के साथ पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और करीब 10 हजार लोगो को रोजगार भी मिलेगा।
उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां योगी पर बुलडोजर चलवाने और अपराधियों के घरों की कुर्की करवाने वाले सख्त प्रशासक की छवि बनी तो लव जिहाद’ के खिलाफ कानून लाने और मुस्लिम आबादी कम करने वाले उनके बयानों के चलते विपक्ष ने उन्हे मुस्लिम विरोधी और प्रखर हिंदुत्ववादी नेता का तमगा दे दिया।
हालांकि योगी ने अपने कार्यकाल में हर वर्ग के लिए काम करने का प्रयास किया है। सीएम ने यूपी में ‘सभी के लिए बिजली’ अभियान शुरू किया और राज्य में बिजली के बुनियादी ढांचे को व्यापक रूप से और उन्नत किया। उनके ‘पर्यप्त बिजली’ मिशन के तहत, उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार, राज्य ने जिला मुख्यालयों पर 24 घंटे, तहसीलों में 20 घंटे और गांवों में 18 घंटे बिजली का लक्ष्य रखा। बिजली विभाग द्वारा हुई 2021 की समीक्षा में इस कठिन लक्ष्य को लगभग पूरा कर लिया गया है। साल 2017-21 की अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक बिजली आपूर्ति की औसत अवधि 17.43 घंटे, तहसील क्षेत्रों में दैनिक बिजली आपूर्ति की औसत अवधि 20.41 घंटे और जिला मुख्यालयों में दैनिक बिजली आपूर्ति की औसत अवधि 23.14 घंटे थी।
इसके अलावा एविएशन सेक्टर में कई ठोस बदलाव हुए है 2017 में जहाँ राज्य से केवल 25 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गंतव्यों के लिए उड़ानें थीं वो अब 2021 में लगभग तीन गुना बढ़कर 71 हो गयी है जिसमें 59 राष्ट्रीय और 12 अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें शामिल हैं। यूपी में 2017 में चार कामकाजी हवाई अड्डे थे – लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर और आगरा – जिनमें से केवल लखनऊ और वाराणसी सीमित मार्गों के लिए अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को संभाल रहे थे। वहीं 2021 में सूबे में आठ कामकाजी हवाई अड्डे हो गए हैं। इसके अलावा जेवर एयरपोर्ट के निर्माण का कार्य भी प्रारम्भ हो गया है जो यूपी को आर्थिक गति देने के साथ प्रदेश को विश्व से जोड़ने का काम करेगा।
मुख्यमंत्री के प्रयासों के चलते आज यूपी Ease Of Doing Business (EODB) रैंकिंग में कई औद्योगीकृत राज्यों को पीछे छोड़ते हुए दूसरे नंबर पर आ गया है। लेकिन क्या धर्म और जाति की राजनीति के लिए मशहूर यूपी में विकास कभी राजनैतिक मुद्दा बन पाएगा ये बड़ा सवाल है?

