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क्या ये चुनावी मौसम के बदलते मिज़ाज की झलक है

आर्टिकल/इंटरव्यूक्या ये चुनावी मौसम के बदलते मिज़ाज की झलक है

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अमित बिश्नोई
क्या इसे बदलते चुनावी मौसम का बदलता मिज़ाज समझा जाय जो आज फूलपुर और प्रयागराज में आयोजित राहुल गाँधी और अखिलेश यादव की संयुक्त रैलियों में नज़र आया. दोनों ही सभाओं में राहुल और अखिलेश के समर्थक या उनको सुनने आये लोग सुरक्षा के लिए बनाई गयी “डी” का घेरा तोड़कर ठीक अखिलेश यादव और राहुल गाँधी के पास पहुँच गए. फूलपुर में तो स्थिति ये हो गयी कि दोनों ही नेताओं को चुनावी भाषण दिए बिना वहां से निकलना पड़ा क्योंकि प्रयागराज की चुनावी रैली के लिए देर हो रही थी और दोनों को वहां पर सम्बोधित करना था. प्रयागराज पहुँचने पर वहां भी वहीँ हालात बन गए जो फूलपुर में थे। राहुल और अखिलेश सुनने और उन्हें छूने वाले लोग मंच तक पहुंच गए. हालत ये थी कि सुरक्षा कर्मियों को लोगों को राहुल और अखिलेश से दूर रखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ रही थी.

प्रयागराज में तो एकतरफ अखिलेश और राहुल भाषण भी दे रहे थे और लोगों से हाथ भी मिला रहे थे क्योंकि भीड़ उनसे हाथ मिलाने के लिए बिलकुल बेकाबू हो गयी थी. दोनों ही नेताओं काफी छोटा भाषण दिया और वहां से निकलने में ही भलाई समझी। आम तौर पर बड़े नेताओं को सुनने के लिए बड़ी भीड़ का होना कोई बड़ी बात नहीं होती लेकिन फूलपुर और प्रयागराज में भीड़ के अंदर जो जोश नज़र आया वो शायद इस चुनाव में पहली बार देखा गया. देखा जाय तो इस सुरक्षा में बड़ी लापरवाही माना जायेगा, दोनों ही नेता स्पेशल सुरक्षा घेरे में रहते हैं, राहुल गाँधी तो खासकर केंद्रीय सुरक्षा में रहते हैं ऐसे में जिस तरह लोग बेकाबू होकर उनके करीब पहुंचे वो काफी खतरनाक भी हो सकता था.

लेकिन चुनावी नज़र से इन दोनों चुनावी रैलियों की व्याख्या करें तो इसे लोकसभा के चुनाव के बदलते मिज़ाज की झलक कह सकते हैं। अखिलेश हों या फिर राहुल दोनों की चुनावी रैलियों में भीड़ ज़्यादा ही रहती है लेकिन इस तरह बेकाबू नहीं होती कि सिक्योरिटी घेरा ही तोड़ दे. देखा जाय तो पिछले चार चरणों के बाद लोगों का जो परसेप्शन बदला है और विशेषकर यूपी में अखिलेश और राहुल गाँधी की संयुक्त सभाओं की संख्या जिस तरह बढ़ रही हैं उसने एक नया चुनावी माहौल पैदा किया है. दोनों ही पार्टियों के समर्थकों में जो जोश दिखने लगा है वो एक अलग रुख की कहानी बता रहा है, यकीनन फूलपुर और प्रयागराज के दृश्य भाजपा को नहीं अच्छे लगेंगे। भीड़ तो प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी सभाओं में कम नहीं होती, तालियां बजाने वाले भी कम नहीं होते लेकिन जिसने भी 2019 की मोदी जी की चुनावी रैलियां देखी हैं वो तब और आज की रैलियों का अंतर साफ़ बता देगा। भीड़ तब भी होती थी और आज भी है लेकिन कमी है तो सिर्फ जोश की. वही जोश जो 2019 में भाजपा की रैलियों में दिखाई दे रहा था आज राहुल और अखिलेश की रैलियों में दिखाई दे रहा.

दोनों ही पार्टियों का चुनावी गठबंधन पहले भी हुआ था लेकिन तब वो नहीं दिख रहा था जो आज दिख रहा है. इस बार ऐसा लग रहा है कि गठबंधन सिर्फ नेताओं में नहीं बल्कि पार्टियों के कार्यकर्ताओं में भी हुआ है. दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्त्ता दिल से एक दूसरे की मदद करते हुए नज़र आ रहे हैं। अखिलेश और राहुल भी जिस तरह एक दूसरे के उम्मीदवारों को जिताने की अपील कर रहे हैं उसने भी पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया है, विशेषकर अखिलेश यादव जिस तरह अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कांग्रेस उम्मीदवार को जिताने के लिए हामी भरवाते हैं वो शायद गठबंधन की राजनीति में एक नया प्रयोग है।

चुनाव जब शुरू हुआ था तब माना जा रहा था कि इंडिया गठबंधन को कुछ सीटें मिल जाएँगी लेकिन पांचवें चरण के मतदान से पहले चर्चा का विषय बदल चूका है. आज चर्चा इस बात की हो रही कि भाजपा 50 सीटें पार कर पाएगी या नहीं। कहा जा सकता है कि अमेठी और रायबरेली के एपिसोड के बाद कांग्रेस और सपा फ्रंट फुट पर आ गयी है वहीं भाजपा की रणनीति को कहीं न कहीं झटका लगा है और उसने जैसा सोच रखा था वैसा नहीं हो रहा है। यूपी में इधर राजनीतिक परिस्थितियों में जो बदलाव हुए वो भी भाजपा के पक्ष में नहीं गए. अमेठी की बात लें तो वहां पर स्मृति ईरानी को अमेठी भाजपा से ही सहयोग नहीं मिल रहा है. मोदी जी स्मृति ईरानी के लिए चुनाव प्रचार करने नहीं गए, ये एक अलग कहानी है कि क्यों नहीं गए. इसपर अलग से लिखूंगा। अमेठी के राजा संजय सिंह बिलकुल शांत दिखाई दे रहे हैं, वो अमेठी में अभी दो दिन पहले ही पहुंचे हैं, स्मृति ईरानी के साथ उनका कोई मंच शेयर न करना काफी संकेत दे रहा है. कुछ इसी तरह की बातें रायबरेली में भाजपा के लोकल नेतृत्व के असहयोग की सामने आयी हैं, चाहे वो भाजपा में नए नए गए मनोज पांडेय हों या फिर अदिति सिंह। इसी तरह राजा भैया का भाजपा में जाते जाते अचानक सपा के पक्ष में चला जाना।

कल पांचवें चरण का मतदान है. यूपी की 14 सीटों पर कल वोट डाले जायेंगे। इस चरण में कई VVIP सीटें हैं जिनमें अमेठी, रायबरेली और लखनऊ शामिल हैं. ऐसे में फूलपुर और प्रयागराज में जिस तरह का जोशीला नज़ारा आज देखने को मिला वो कल मतदान के वोटिंग प्रतिशत में भी नज़र आ सकता है. फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक महीना पहले जो इंडिया गठबंधन पस्त दिखाई दे रहा था आज मस्त दिखाई दे रहा है.

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