क्या खत्म हो रहा है मोदी मैजिक?

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क्या खत्म हो रहा है मोदी मैजिक?

सुनील शर्मा

किसान आंदोलन से लेकर कोरोना से मुकाबले में नाकामी पड़ी भारी
पश्चिम बंगाल चुनाव में करारी हार से लेकर पंचायत चुनाव में भी मिली निराशा

लंबे अरसे से लोगों के दिल-दिमाग पर हावी मोदी मैजिक क्या अब उतार पर है। यह बड़ा सवाल जहां भाजपा संगठन को परेशान किये हुए है वहीं देश भर में इस बात की सुगबुगाहट हो रही है। 2021 में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में असम और पुडुचेरी भाजपा के लिए राहत लेकर आए। लेकिन पश्चिम बंगाल ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है। यहां भाजपा ने ममता बनर्जी के खिलाफ अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। मगर ममता बनर्जी खुद हारकर भी अपनी पार्टी को एकतरफा जीत दिलाने में कामयाब रहीं। मोदी मैजिक को पूरी तरह से बेमानी साबित करते हुए ममता बनर्जी नेे तीसरी बार सीएम पद की शपथ भी ले ली है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई महीने पहले पश्चिम बंगाल में चुनावी अभियान की शुरूआत कर अनेक बार राज्य का दौरा किया। पीएम मोदी ने खुद कई चुनावी रैलियों को संबोधित किया। भाजपा का दावा था कि पश्चिम बंगाल में उनकी बहुमत की सरकार बनेगी लेकिन वह मात्र 80 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी। भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी ममता बनर्जी को तीसरी बार पश्चिम बंगाल का सीएम बनने से नहीं रोक पाई। तमिलनाडु में एआईएडीएमके साथ गठबंधन करना भी भाजपा का रास नहीं आया और उसे उम्मीद के अनुरूप सफलता नहीं मिली। केरल में भाजपा को बहुत आशा पहले से ही नहीं थी और उसे सफलता भी नहीं मिली। हालांकि असम में पार्टी सत्ता विरोधी लहर को दरकिनार करते हुए भाजपा ने फिर से सत्ता हासिल की। वहीं, पुडुचेरी में भी भाजपा को राहत मिली और वह सरकार बनाने की स्थिति में आ गयी। लेकिन जिन चुनावों में भाजपा के ब्रांड बन चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद रणभूमि में अपनी पूरी सेना लेकर उतरे हों उसमें भाजपा का यह हाल होना पार्टी के लिये चिंता की बात तो है ही। पार्टी में अंदरूनी तौर पर भी मोदी नीति को लेकर विरोधी स्वर उठने शुरू हो गये हैं। हालांकि इन विरोधी स्वरों को अभी मंथन का नाम दिया जा रहा है मगर सिक्के का दूसरा पहलू यही है कि तीन राज्यों के चुनावों में मिली करारी हार के लिये मोदी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

चुनावों में मोदी मैजिक न चलने का प्रमुख कारण किसान आंदोलन के रूप में सामने आ रहा है जिसे भाजपा ने शुरूआत से ही हल्के में लिया। कभी चंद किसानों का आंदोलन बताया तो कभी खालिस्तानियों को आंदोलन में शामिल बताकर आंदोलन का रूख मोड़ने का प्रयास किया। इससे इतर किसानों में मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनता गया और जगह-जगह हुई पंचायतों ने देश भर के किसानों के सामने मोदी सरकार को किसान विरोधी साबित कर दिया। लेकिन मोदी सरकार और उसके मंत्री किसान आंदोलन को नजर अंदाज करते रहे जिसका खामियाजा उसे तीन राज्यों खासकर पश्चिम बंगाल में भुगतना पड़ा।
मोदी मैजिक न चलने का दूसरा प्रमुख कारण कोरोना की दूसरी लहर को नजरअंदाज कर मोदी सरकार का चुनावी अभियान में जुट जाना रहा। लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी रही कि कोरोना संक्रमण काल में भी भाजपा ने चुनाव टालना जरूरी नहीं समझा। वहीं जब लोग अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन के अभाव में तड़प कर मर रहे थे तब पीएम मोदी चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे थे। हालांकि चुनावी रैलियां सभी राजनीतिक दलों ने की और भीड़ जुटाने और कोरोना संक्रमण फैलाने के लिये सभी दल जिम्मेदार हैं मगर सत्तारूढ़ पार्टी होने के नाते भाजपा चाहती तो इन चुनावों को टाल कर अनेक जिंदगियों को बचा सकती थी। चुनावी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने में जुटी भाजपा का यह कार्य उसकी छवि के अनुरूप न होने के कारण उसका अंदरूनी विरोध हुआ और उसे हार का सामना करना पड़ा। इस फैक्टर की बानगी उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव में भी देखने को मिली है जहां भाजपा को सत्तारूढ दल होने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा है।

यह हार बताती हैं कि मोदी मैजिक अब उतार पर है। यदि पार्टी को आने वाले चुनाव में जीत चाहिये तो उसे जनता को मुंगेरीलाल के सपने दिखाने की बजाये जमीन पर उसका भला करके दिखाना होगा। कोरोना की पहली लहर में राहत पैकेज सरकार ने दिये मगर उसका लाभ आम आदमी को प्रत्यक्ष रूप से कहीं होता नहीं दिखा। विकास होता दिखा मगर इतना तेज की आम आदमी की पहुंच से ही बाहर हो गया। जी हां, हमें बुलेट ट्रेन चाहिये मगर अपनी पुरानी ट्रेनों को भी समय से चलने वाली और सुविधाजनक बनाना जरूरी है। हमें विकास चाहिये मगर अपने अस्तित्व को भी बचाये रखना जरूरी है। हमें मंदिर भी चाहिये और मस्जिद भी मगर हमें अस्पताल और ऑक्सीजन बेड पहले चाहिये। हमें 5जी नेटवर्क भी चाहिये मगर हमें जीवन यापन के लिये नौकरियां भी चाहियें। सिर्फ हिंदू-मुसलमान की बात कह कर लोगों का पेट नहीं भरा जा सकता और खाली पेट किसी का भी मैजिक नहीं सुुहाता चाहे वह कितना भी दर्शनीय क्यों न हो और चाहे वह कितना भी प्रभावित क्यों न करता हो। यदि आम आदमी की जरूरतें पूरी न हुईं या सरकारी योजनाएं आम आदमी के किसी काम की न हों तो अच्छे से अच्छा मैजिक भी हवा होते देर नहीं लगती, जिसकी बानगी हमने हाल ही में देखी भी ली है।

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