मेरठ। साल में चार महीने चतुर्मास के होते हैं। ये वो महीने होते हैं जबकि बरसात का दौर चलता है। इस समय चतुर्मास शुरू हो गया है। चतुर्मास में विशेष रूप से जल शुद्धि होती है। चतुर्मास में तीर्थ और नदी इत्यादी में स्नान करने का महत्त्व है। नदियों के संगम में स्नान पश्चात पितरों एवं देवताओं का तर्पण कर जप, होम आदि करने पर अनंत फल की प्राप्ति होती है। ग्रहण के समय को छोड़कर रात में और संध्याकाल में स्नान नहीं करना चाहिए। इन दिनों में गर्म पानी से स्नान नहीं करना चाहिए। गर्म पानी का त्याग करने से पुष्कर तीर्थ में स्नान करने का फल मिलता है।
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जो मनुष्य जल में तिल आँवले का मिश्रण और बिल्वपत्र डालकर ॐ नमः शिवाय का चार-पाँच बार जप करके उस जल से स्नान करते हैं तो उसे नित्य ही पुण्य की प्राप्त होती है। बिल्वपत्र से वायु का प्रकोप दूर होता है इससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
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चतुर्मास के दिनों में जीव-दया विशेष धर्म है। प्राणियों से द्रोह करना कभी धर्म नहीं माना गया। इसलिए सर्वथा प्रयत्न कर प्राणियों के प्रति दया करनी चाहिए। जिस धर्म में दया नहीं है वह दूषित माना जाता है। सब प्राणियों के प्रति आत्मभाव रखकर दया करना सनातन धर्म है। धर्मों में दान-धर्म की विद्वान सदा प्रशंसा करते हैं। चतुर्मास में जल,अन्न,गौ दान, वेदपाठ और हवन इत्यादी का विशेष महत्व है।

