अमित बिश्नोई
कोरोना काल में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑनलाइन मोड का सहारा लिया जा रहा है।लेकिन बीते 2 साल से ऐसे बच्चों को ढेरों मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। बड़ी बात यह है कि प्रदेश भर में ऐसे बच्चों की संख्या कम नहीं है मजबूरन बच्चों को या तो क्लासेज छोड़नी पड़ रही है या किसी तरह जोड़-तोड़ कर पढ़ाई को कंटिन्यू कर रहे हैं। सबसे बुरा हाल प्राइमरी स्कूलों का है। यहां सैकड़ों बच्चे बिना स्मार्टफोन के हैं जबकि शासन का पूरा फोकस ई-लर्निंग योजना पर है।
70 प्रतिशत के पास नहीं मोबाइल
सरकारी स्कूलों की बात करें तो प्रदेश भर में ऐसे करीब 70 प्रतिशत स्टूडेंट्स है जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। जिसकी वजह से यह बच्चे ऑनलाइन क्लासेस में भी उपस्थित नहीं हो पाते हैं। जबकि ग्रामीण इलाकों से ताल्लुक रखने वाले बच्चे शिक्षा से पूरी तरह से दूर हो गए हैं। ऑनलाइन क्लास करने के लिए स्मार्टफोन भी नहीं है और संक्रमण के चलते स्कूल भी नहीं जा रहे हैं। इस तरह के बच्चों को पिछले दो सालों में पढ़ाई का काफी नुकसान झेलना पड़ा है।
अब मोहल्ला पाठशाला पर जोर
प्राइमरी स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई है। शिक्षा से वंचित रह गए स्टूडेंट को वापस इससे जोड़ने के लिए शासन ने अब मोहल्ला पाठशाला शुरू किया है। इसके तहत सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए उनके गांव में ही टीचर्स क्लासेस लगाएंगी। बच्चों का ग्रुप बनाकर उन्हें पढ़ाया जाएगा।
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नहीं मिली किताबें
बेसिक प्राइमरी स्कूलों में जहां बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं है जिसकी वजह से वह लर्निंग एप्स का भी प्रयोग नहीं कर पाते हैं। वहीं दूसरी बड़ी समस्या यह भी है कि बच्चों को अभी तक किताबें भी नहीं मिल पाई हैं। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को सरकार की ओर से फ्री बुक्स मिलने का प्रावधान है। लेकिन लंबा वक्त बीतने के बाद भी स्टूडेंट्स अभी तक किताबों से वंचित हैं। प्रदेश भर के कई जिलों की यही स्थिति है।
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