छिपाने की कोशिश में और धधक उठी चिताओं की लौ

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छिपाने की कोशिश में और धधक उठी चिताओं की लौ

  • नवेद शिकोह
छिपाने की कोशिश में और धधक उठी चिताओं की लौ

न्यूटन के गति के नियम में क्रिया की विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। लखनऊ के बैकुंठ धाम श्मशान घाट में बड़ी तादाद में जलती लाशों का सच छिपाने की कोशिश में ये सच और भी उजागर हो गया। श्मशान कीपरदेदारी के लिए बाउंड्री की हाइट ऊंची करके इसे कवर्ड करने से चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत चरितार्थ हो गई। बाउंड्री पर टीन की चादरें लगाने का सिलसिला शुरू ही हुआ था कि ये बड़ी खबर बन गई कि यूपी सरकार कोविड में मरने वालों की संख्या छिपाने के लिए इस हद तक उतर आई है। ये सच भी है कि यही एनर्जी यदि इलाज की समुचित व्यवस्था में लगाई जाती तो बेहतर था। किसी भी राज्य की जनता की बुनियादी जरूरतें स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार ही हैं। यदि ये आवश्यकताएं पूरी नहीं हुईं तो जनता का विश्वास टूटना ही है। भ्रम ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकता और सच को ज्यादा देर तक नहीं दबाया जा सकता।

करीब डेढ़ वर्ष पहले वैश्विक महामारी ने दस्तक दे दी थी। चौदह महीने पहले भारत में कोरोना वायरस आ चुका था। ये भी आशंका थी कि कोरोना की सेकेंड वेब आएगी। एक वर्ष तक हम अभयस्त हो गए थे। कोरोना महामारी के नाम पर अथाह राशि इकट्ठा हुई थी। बावजूद इन सबके हमने क्या तैयारी की? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ी आबादी है। सवा साल में यहां कोरोना से लड़ने के लिए स्वास्थ्य संबधित कितनी तैयारिया हुईं? यदि पर्याप्त तैयारियां होतीं तो क्या मेडिकल व्यवस्था चरमराती। वो तैयारियां नहीं हुईं जो होना चाहिए थीं। राजधानी लखनऊ जहां बरसों से सबसे ज्यादा हाइटेक हास्पिटल हैं यहां मौत की आंधी आ गई। अंदाजा लगाइए कि पूरे प्रदेश में क्या हाल होगा।

पूरे देश और ख़ासकर यूपी में कोरोनों की तबाही की बढ़ती मुसीबतों के साथ यूपी सरकार घिरती जा रही है। जानलेवा संक्रमण के खतरे और नाकाफी स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों में गुस्सा है। आपातकाल जैसे इन हालात में सरकार के फैसलोंं पर भी जनता सवाल उठा रही है । विरोधी या पराए ही नहीं अपने भी सरकारी फैसलों को गलत ठहरा रहे हैं। तंज़ भी खूब हो रहे हैं।

लखनऊ के बैकुंठ धाम में लाशों की कतारों का वीडिया वायरल होने के कुछ घंटे बाद ही आज सुबह से ही शमशान घाट की बाउंड्री को टीन की चादरों से ढकने और ऊंचा करने का काम शुरू हो गया ताकि जलती हुई बेइन्तेहा चिताओं की तस्वीरें ना ली जाएं। इस पर तंज़ करते हुए कहा जा रहा है कि ये तो सरकार की उपलब्धि है। सरकार का यही चुनावी वादा था जो पूरा हो रहा है। इसपर एतराज़ नहीं होना चाहिए। इस काम की तो प्रशंसा होना चाहिए है।

मालूम हो कि पिछले विधानसभा चुनाव की चुनावी जनसभाओं में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने शमसान -कब्रिस्तान को मुद्दा बनाया था। तत्कालीन अखिलेश सरकार के पहले वर्ष मे ही यूपी के कब्रिस्तानों की बाउंड्री के लिए बजट पास हुआ था और फिर क्रबिस्तानों की चहारदीवारी का निर्माण भी हुआ था। इस बात को संज्ञान में लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी विधानसभा चुनाव के प्रचार में चुनावी रैलियों के संबोधन में कहा था कि यदि यूपी में भाजपा की सरकार बनीं तो सिर्फ कब्रिस्तानों पर काम नहीं होगा, शमशान घाट पर भी काम होगा। उनके कहने का आशय था कि जिस तरह कब्रिस्तान की बाउंड्री सपा सरकार में बनी वैसे ही शमशानों घाटों में भी बाउंड्री बनेगी और अब वही वादा निभाया जा रहा है भले ही इसके आड़ में नाकामी छुपाने की कोशिश हो.

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