सुनील शर्मा
लो जी लो करलो बात, अपने साईकिल वाले नेताजी भी हैं न पहिये की तरह चक्करघिन्नी खाते रहते हैं। पहले अपने लिये कह रहे थे कि नहीं लगवाऊंगा कमल वालों की वैक्सीन, अब दूसरों के बच्चों के लिये कह रहे हैं पहले टीका, फिर परीक्षा। समझ नहीं आ रहा कि खुद वैक्सीन पर संदेह करने वाले दूसरों के बच्चों को पहले वैक्सीन लगवाने के लिये क्यों कह रहे हैं। खुद को वैक्सीन पर भरोसा नहीं है और बच्चों को पहले लगवाने की बात कर रहे हैं।
यह सवाल शर्माजी को परेशान किये जा रहा था तो उठाया पेपर-कलम और एक बार फिर पहुंच गये नेताजी के पास। इस बार कार्यालय में थोड़ा सन्नाटा था, और हो भी क्यों न सारे धरने-प्रदर्शन उन्होंने किये लेकिन किसानों के खेत में साईकिल की बजाये हल चल रहा है। अब कितना ही गले मिल लें लेकिन अपने पाले के वोट कोई अपना ही खींच कर ले जाये तो दर्द तो होता ही है।
खैर इन बातों से शर्माजी को क्या लेना, उन्होंने अपना इंटरव्यू शुरू किया और सवाल दागा, नेताजी, बीती दो जनवरी को जब आपकी साइकिल तेज चल रही थी तो आपने कहा था की कमल वाली वैक्सीन पर भरोसा नहीं करते इसलिये नहीं लगवायें ये वैक्सीन। आपकी सरकार आयेगी तो ही लगवायेंगे वैक्सीन। अब आप कह रहे हैं कि छात्रों को पहले टीका-फिर परीक्षा। तो क्या अब कमल वाली वैक्सीन पर आपको भरोसा हो गया है या पंचर हुई साईकिल को खींचते हुए दम फूल गया है। या यह भी बस सरकार को घेरने और नंबर बढ़ाने की राजनीति है।
शर्माजी की बातों से साईकिल पर बैठे युवा नेताजी थोड़ा कसमसाये, मगर जवाब देना मजबूरी थी। किसी तरह खुद को संभाला और बोले, अमां शर्माजी, आप तो पत्रकार हो, सब जानते हो। अब हमारे कहने ना कहने से क्या हो रहा है, लोग तो वैक्सीन लगवा ही रहे हैं न। अरे जब हमारे चाचा, बुआ-फूफा से लेकर कार्यकर्ताओं तक ने वैक्सीन लगवा ली तो हम कर भी क्या सकते हैं। अब भईया सरकार आई तो अगले साल आयेगी, कोरोना तो सिर पर खड़ा है। लेकिन हमारा वादा है, हमारी सरकार आयेगी तो सबको मुफ्त में वैक्सीन लगवायेंगे।
शर्माजी को नेताजी की मजबूरी कुछ समझ आयी लेकिन संशय मन में कायम था सो बोल पड़े, मगर नेताजी पहले आपने वैक्सीन लगवाने से मना किया फिर कह रहे हैं की बच्चों को लगवाओ, कहीं इससे कुछ नुकसान तो नहीं हो जायेगा।
शर्माजी का सवाल सुनते ही नेताजी आगबबूला हो गये और गुस्से में बोेले, अरे नुकसान तो हो ही रहा है न। हम जनता से वादा कर रहे हैं फ्री में वैक्सीन लगवाने की और बाबाजी सबको बिना पैसे लिये वैक्सीन लगवाये जा रहे हैं। अरे बाबाजी तो उड़-उड़ कर सारे प्रदेश में घुम रहे हैं, वैक्सीन लगवा रहे हैं, चुनाव आने तक तो मेरे अलावा कोई बचेगा नहीं बिना वैक्सीन लगवाये। तो शर्माजी, आ भी गयी हमारी सरकार तो फ्री में किसको लगवायेंगे, बाबाजी किसी को छोड़ेंगे तो न।
आप भी बात कर रहे हो नुकसान की, एक तो गले मिलकर छाती पर हल चलाने वाले ले गया सारे किसानों के वोट। अब न मुद्दा है और न बची है हिम्मत तो करें क्या। अरे भईया, जब इतनी बड़ी-बड़ी परीक्षाएं करा दीं सरकार ने तो हमारे कहने से अब क्या रूक जायेगी। इतना तो हम भी जानते हैं वैक्सीन बनायी जाती है, जादू से पैदा नहीं होती, तो सरकार कहां से सब बच्चों को एकदम से लगवा देगी वैक्सीन। अब नहीं लगवायेगी तो हम तो विरोध करेंगे ही न।
शर्माजी, हमें करनी है राजनीति, अब विपक्ष के काम की सराहना कर देंगे तो चल ली हमारी दुकानदारी। हमें तो विरोध करना आता है और वो ही कर रहे हैं। वरना पता तो हमें भी है कि हमारे अलावा सब लगवा रहे हैं वैक्सीन। सारे रिश्तेदार वैक्सीन लगवा चुके हैं और अब हमें अपने घर भी आने नहीं दे रहे। कह रहे हैं पहले वैक्सीन लगवाओ फिर हमारे घर आओ। अरे हम तो कह के फंस गये, अब तो विदेशी वैक्सीन आने वाली है बस उसका इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही आयेगी, तुरंत लगवा लेंगे क्योंकि जान तो भईया हमें भी प्यारी है। लेकिन हम फिर कह रहे हैं, कमल वालों की वैक्सीन बिल्कुल नहीं लगवायेंगे।
अब शर्माजी उठ खड़े हुए, उनकी समझ में आ चुका था कि आपदा को अवसर में बदलने का कोई मौका देश के नेता भी नहीं छोड़ते। तो नेताओं की बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। और कोई गंभीरता से ले रहा होता तो टीकाकरण केंद्रों पर लंबी कतारें न लगी होती, मिनटों में स्लाॅट बुक न हो रहे होते। तो नेताजी को छोड वैक्सीन लगवा कर आया जाये …

