सैंकड़ों साल पुराने बहीखातों में है लाखों यजमानों की वंशावली

उत्तराखंडसैंकड़ों साल पुराने बहीखातों में है लाखों यजमानों की वंशावली

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सैंकड़ों साल पुराने बहीखातों में है लाखों यजमानों की वंशावली

  • हरिद्वार के पंडों के पास मौजूद है अपने यजमानों की पूरी वंशावली
  • वैज्ञानिक और प्रमाणित तरीके से सहेजा गया है इन वंशावलियोें को
  • अनेक जमीनी विवादों में अदालतों ने भी मानी वंशावलियोें की प्रमाणिकता

हरिद्वार। यदि हमसे अपने पूर्वजों के बारे में पूछा जाये तो हम में से अधिकतर लोेग दो-तीन या अधिक से अधिक 10 पीढ़ियों के नाम बता पायेंगे। मगर हरिद्वार के पंडों के पास आपके परिवार की पूरी वंशावली मौजूद हो सकती है। यदि आपकी पीढ़ियों में से किसी ने हरिद्वार में पतित पावनी गंगा में स्नान करते हुए इन पुरोहित/पंडों से धार्मिक अनुष्ठान कराया हो या परिवार के सदस्य का अंतिम संस्कार, पिंडदान हरिद्वार में किया गया हो या कोई अन्य धार्मिक परंपरा का निर्वहन हरिद्वार में किया गया हो तो निश्चित ही आपके परिवार की वंशावली इन पंडों के बहीखाते में मिल सकती हैै। जजमान का नाम-पता मालूम चलते ही यह पुरोहित कई पीढ़ियोें का लेखा-जोखा सामने रख देते हैं। यह वंशावली बेहद प्रमाणिक होती है और इसमें आपको अपने पूर्वजों के हस्ताक्षर भी मिल जायेंगे। इन वंशावलियोें की प्रमाणिकता अदालतों ने भी अनेक जमीनी विवाद में बतौर साक्ष्य मानी है और इनके आधार पर मुकदमों में फैसला भी सुनाया गया है।

हरिद्वार में हर की पौड़ी के समीप कुशाघाट में बने पंड़ो के घर सामान्य दिखते हैं मगर देखा जाये तो लाखों परिवार की वंशावलियों को सहेज कर रखने वाली लाइब्रेरिया हैं। इन घरों में मौजूद वंशावलियों को इतने वैज्ञानिक और प्रमाणित तरीके से सहेजा गया है कि यजमान को नाम और पता बताने की देर होती है और कुछ ही समय के बाद उसके पूरे परिवार की वंशावली उसके सामने होती है। लाखों लोगों की वंशावलियों में से यजमान के परिवार की वंशावली को संजोने से लेकर ढूंढने का तरीका भी बेहद खास होता है। मां गंगा के पवित्र जल में स्नान कर पुण्य कमाने या अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार, पिंड दान या अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले आपके पुरखों के हरिद्वार में आने का कारण, आने का दिन से लेकर अन्य जानकारियां भी मिल सकती हैं।

हरिद्वार में 2000 पंडे संभालते हैं लाखों वंशावलियां
हरिद्वार में रह रहे करीब 2,000 पंडे ‘बही खातों’ में अपने यजमानों की वंशावली को सुरक्षित रखते हैं। सैंकड़ों साल पुरानी वंशावलियां जिन्हें बोलचाल में बहीखाता भी कहा जाता है को बेहद सावधानी से पलटना पड़ता है। क्योंकि समय के साथ इन बहीखातों के पन्ने बेहद नाजुक हो गये हैं। हरिद्वार आने वाले लोगों के गांव, जिले और राज्य के आधार पर बनी इन प्राचीन वंशावलियों को अदालत ने भी कई मामलों में प्रमाणिक माना है और जमीन को लेकर हुए अनेक विवादों में इन्हीं वंशावलियों के आधार पर फैसला सुनाया गया है। पंडों की अलमारियों में रखे गए सैकड़ों साल पुराने बही खातों में दर्ज वंशावली या सूचना गूगल को भी मात देती है।

कागजों के बहीखातों से पूर्व वंशावलियों को भोजपत्र पर लिखा जाता था। कहा जाता है कि पूर्व में जब लिखित वंशावलियों का प्रचलन बेहद कम था तब हरिद्वार के पंडे अपने यजमानों के परिवार की जानकारियां मुहंजुबानी याद रखते थे। वह आने वाली पीढ़ियों को जुबानी तौर पर यजमानों का नाम, कुल और मूल स्थान बताते थे। अपनी अदभुत स्मरणशक्ति के चलते इन पुरोहितों को अपने यजमानों की वंशावली पूरी तरह से कंठस्थ होती थी।

करिंदे पहुंचाते हैं जजमानोें को उनके पुरोहितों तक
हरिद्वार आने वाले जजमानों को उनके पुरोहितों तक पहुंचाने का काम करने के लिये पंडों के प्रतिनिधि गंगा घाट आदि पर मौजूद रहते हैं। स्नान-दान, श्रद्धा या अस्थि विजर्सन के लिए दूर-दराज से आने वाले यजमानों के नाम और पता बताते ही यह करिंदें उनके पुरोहितों तक पहुंचाते हैं। इन करिंदों को वेतन के साथ कमीशन भी दिया जाता है। हर गोत्र, जाती के पुरोहित अलग होते हैं और यह करिंदे सही पुरोहित तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं।

खास तरीके से लिखी और संयोयी जाती हैं वंशावलियां
सैंकड़ों साल का वंशावली संजोये हुए इन बहीखातों को लिखने से लेकर संजोने तक का कार्य बेहद सावधानी सेे किया जाता है। मजबूत कागज से बंधे बहीखातों के पन्ने भी मोटे होते हैं। एक जमाने में इन वंशावलियों को मोरपंख से लिखा जाता था। समय बदलने के साथ पुरोहित वंशावली लिखने में जी-निब वाले होल्डर और अब अच्छी स्याही वाले पेनों का इस्तेमाल करने लगे है। इन बहीखातों पर लिखी वंशावली लंबे समय तक चले इसके लिये अधिकतर काली स्याही प्रयोग में लायी जाती है।

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