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राम मंदिर विवाद: वर्ष 2019, जब रामलला की कोर्ट में हुई जीत, खत्म हुआ था बरसों का संघर्ष

उत्तर प्रदेशराम मंदिर विवाद: वर्ष 2019, जब रामलला की कोर्ट में हुई जीत,...

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History of ram mandir buzinessbytes series 8: राम लला अयोध्या में विराजमान हो रहे हैं। सारी दुनिया इसकी साक्षी बन रही है। देश दुनिया में राम नाम की गूंज और एक बार फिर से दिवाली जैसा माहौल दिखाई दे रहा है। घर घर में दीए जलाकर राम जी के स्वागत की तैयारी चल रही हैं। 500 साल का इंतजार बड़े संघर्षों को पार कर खत्म हुआ है। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद देशभर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। कोर्ट में रामजी की जीत हुई। यह पहली बार था जब रामलाल को उनके मंदिर की जमीन वापस मिल चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट ने श्री राम लला विराजमान को टाइटल दिया। उन्होंने विवादित 2.77 एकड़ जमीन के नाम कर दी। मुस्लिम पक्ष को उन्होंने 5 एकड़ जमीन अयोध्या में ही किसी स्थान पर देने के सरकार को आदेश दिए। 1993 में अधिग्रहित भूमि भी रामलाल को सौंप दी गई। ट्रस्ट बनाकर मंदिर का संचालन और निर्माण करने जिम्मेदारी केंद्र सरकार को सौंप दी गई। जिसके बाद से ही अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ।

ऐसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट
हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम सुन्नी वक्त बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।उन्होंने अपनी याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को स्थगित कर दिया था। हिंदू पक्ष भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। हाई कोर्ट में जस्टिस डीवी शर्मा के आदेश को लागू किए जाने की मांग हिंदू पक्ष ने की। जस्टिस डीवी शर्मा की राय थी कि विवादित स्थल प्रभु राम जी की जन्मस्थली है। उस जगह मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह बाबर ने मंदिर तोड़कर करवाया था। इसलिए बंटवारे का कोई मतलब नहीं है। उनकी राय थी कि सारी भूमि राम मंदिर के लिए हिंदुओं को दी जानी चाहिए। इसके लिए उन्होंने इस्लाम के कानून का भी हवाला दिया। हालांकि हाई कोर्ट में बहुमत के आधार पर उस वक्त फैसला सुनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने वालों में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय हिंदू महासभा और स्वयं भगवान श्री राम लाल विराजमान थे। वकील पीपी राव, अनूप चौधरी, रवि शंकर प्रसाद , कृष्ण मणि ,रंजीत कुमार केएन भट्ट और सीएस वैद्यनाथन ने अपनी अपनी पार्टी का पक्ष कोर्ट में रखा था। जस्टिस आलम और जस्टिस लोढ़ा याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने जनवरी 1993 में अधिग्रहित की गई जमीन पर किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी उन्होंने किसी भी धार्मिक गतिविधि का आयोजन करने पर भी रोक लगा दिया स्थाई मंदिर में पहले की तरह पूजा जारी रखी जा सकती थी। इस दौरान वक्फ बोर्ड ने हाई कोर्ट के फैसले को आस्था के आधार पर दिया गया निर्णय बताया था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि हिंदू पक्ष 1528 से पहले उसे जमीन पर किसी भी तरह का मंदिर होने की सबूत को प्रस्तुत नहीं कर पाए थे।

मोदी सरकार आने की बात तेज हुई कार्रवाई
2014 में केंद्र में जब मोदी सरकार आए तब मंदिर सुनवाई मामले में तेजी देखी गई कहां जाता है कि सुब्रमण्यम स्वामी ने 6 सालों से लंबित मामले पर तेजी से सुनवाई करने का सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था।उसे वक्त चीफ जस्टिस जगदीश सिंह केहर ने इस विवाद को धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ मामला बताते हुए आपस में बातचीत करते हुए इस मामले का हल निकालने का सुझाव दिया था। इसके लिए दोनों पक्षों को 31मार्च तक का भी समय दिया गया था। समोसे प्रयास होते रहे लेकिन कोई हल नहीं निकल पाया आउट को सेटलमेंट के सारे प्रयास विफल रही। 1989 से लेकर 2017 तक मध्यस्थता के जरिए अलग-अलग लोगों ने कई तरह की समितियां बनाकर बैठकें की लेकिन इस विवाद का कोई हल नहीं निकल पा रहा था। इसके बाद 2018 में केस को संविधान पीठ को भेजने का फैसला आया। मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ में कराए जाने की बात कही गई । 8 जनवरी 2019 को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में विवाद को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंप दिया। 8 मार्च 2019 को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने 8 सप्ताह में सभी पक्षों को मध्यस्थ का प्रयास करने का निर्णय दिया। यह कार्रवाई 13 मार्च को शुरू हुई जिसे मई तक खत्म करना था। लेकिन पक्षों की अपील पर इसे 15 अगस्त तक बढ़ा दिया गया 9 जुलाई को पक्षकार गोपाल सिंह विशारद ने कोर्ट में मध्यस्थता के सुस्त होने का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए इस मामले में रोज सुनवाई की मांग की।

40 दिन की बहस और फैसले का ऐतिहासिक दिन
मदरसा की सारी कोशिश विफल होने के बाद 6 अगस्त से राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर आखिरकार सुनवाई शुरू। कोर्ट ने बाबरी मस्जिद कमेटी,निर्मोही अखाड़ा, श्री रामलला विराजमान समेत कई पक्षों को सुना गया। चीफ जस्टिस ने सभी पक्षों से अनुरोध किया था कि 18 अक्टूबर तक बहस को समाप्त कर दिया जाए। 16 अक्टूबर को ही कोर्ट में यह सुनवाई पूरी कर ली गई। सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस डीवाईचंद्रचूड़, जस्टिस अब्दुल नजीर, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे शामिल थे। शताब्दी उसे चले आ रहे इस विवाद पर 9 नवंबर 2019 को विराम लग गया। जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें सारी विवादित जमीन रामलाल को प्रदान कर दी गई थी।

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