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राम मंदिर विवाद: वर्ष 1949, जब 9 इंच की मूर्ति ने बदल दी थी तस्वीर

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बिज़नेस बाइट्स सीरीज तीन(history of ram mandir buzinessbytes series 4)

history of ram mandir buzinessbytes series 4 : 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में प्रभु राम की 51 इंच की मूर्ति स्थापित की जाएगी। लेकिन, यह पहली बार नहीं है कि इस भूमि पर कोई मूर्ति रखी जा रही है। वर्ष 1949 में पहली बार गर्भ ग्रह में 9 इंच की मूर्ति रखी गई थी। जिसके बाद इस विवाद की पूरी तस्वीर ही बदल गई थी। इतिहासकारों के मुताबिक 22- 23 दिसंबर 1949 की रात अचानक गर्भ गृह के भीतर प्रभु श्री राम के अचानक प्रकट होने की घटना हुई। इस घटना ने पूरी राजनीति को हिला कर रख दिया। यह कहा गया कि भगवान राम ने हिंदुओं को यह संदेश दिया है कि वह अपनी जन्मभूमि को दोबारा से प्राप्त कर लें। दूसरी तरफ आजादी के ठीक दो साल बाद इस बड़ी घटना ने कई समीकारणों को बढ़ावा दिया।

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वहीं इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उस वक्त देश में सांस्कृतिक भावनाओं को भड़काने के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया था। ताकि राम जन्मभूमि विवाद को पूरी तरह से अलग रुख दिया जा सके। इस मामले से हिंदू मुस्लिम विवाद काफी बढ़ गया। दोनों पक्षों ने अदालत में अपनी अपनी याचिका भी दायर की। मुस्लिम पक्ष ने आरोप लगाए गए थे कि कुछ हिंदुओं ने मंदिर परिसर के अंदर घुसकर मूर्तियां रख दी हैं। लिब्राहन आयोग ने भी इस पर जांच रिपोर्ट तैयार की थी। जिसमें कहा गया कि मस्जिद के गुंबद के नीचे मूर्ति रखने में निर्मोही अखाड़े के साधुओं की साजिश थी। अखाड़े के साधु अभिराम दास जिन्हें अब अभयराम दास भी कहा जाता है। उन्हें यह मूर्तियां रखवाई थी। इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई थी। इसमें तकरीबन 60 लोगों को नामांकित किया गया था मुख्य आरोपी अभय राम, सिद्धेश्वर राम, शिव चरण दास थे। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में भी बताया गया की उस वक्त राम दुबे संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी थे। उन्होंने ही मुकदमा दर्ज किया था। रिपोर्ट में उन्होंने लिखा था कि रात में 50 से 60 लोग ताला तोड़कर मंदिर के अंदर प्रवेश कर गए थे। रामलला की मूर्तियां उन्होंने ही स्थापित की थी। आरोपियों ने दीवार पर पीले रंग से श्री राम भी लिखा था । वहां मौजूद कांस्टेबल हंसराज ने उन लोगों को रोकने के प्रयास भी किए थे। इस एक घटना ने जन्मभूमि विवाद का पूरा रुख बदल दिया था।

ऐसे गरमाई राजनीति

मंदिर – मस्जिद विवाद तूल पकड़ता जा रहा था। तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तत्कालीन डीएम को पत्र लिखा कि वह तत्काल उस परिसर से मूर्तियों को हटा दें, लेकिन डीएम ने नेहरूजी को पत्र लिखकर ऐसा करने पर सांप्रदायिक दंगे फैलने का अंदेशा जताते हुए इस फैसले को अमल में लाने से इंकार कर दिया। इतिहासकारों के मुताबिक तब नेहरू जी ने दोबारा पत्र लिखकर डीएम को आदेशों का पालन करने को कहा। डीएम ने तब उस स्थल पर जाल लगाने का सुझाव दिया था। जिसे मान लिया गया। इसी दौरान अपने फैसले में सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करते हुए ताला लगा दिया था।
इसके बाद 1984 में बीजेपी के प्रमुख नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने विश्व हिंदू परिषद के साथ राम लला को मुक्त करने का अभियान चलाया। उन्होंने खुद इसका नेतृत्व किया।

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ऐसे रखी गई राम मंदिर की नींव

1989 में ये अभियान तेज हो गया। यही वर्ष था जब विवादित स्थल के नजदीक राम मंदिर बनाने के लिए नींव रखी गई थी। इसी दौरान उच्च न्यायालय ने भी विवादित स्थल के मुख्य दरवाजों को खोलने के आदेश दिए थे। न्यायालय ने पहली बार ये भी आदेश दिया था की विवादित स्थल को हिंदुओ को दे देना चाहिए।

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