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राममंदिर का इतिहास: जानिए क्या रहा विवाद

Buziness Bytes Series One History of Ram Mandir: Know the Controversy

बिज़नेस बाइट्स सीरीज वन

Ram Mandir History :22 जनवरी 2024……. इतिहास में दर्ज होने जा रहा एक ऐसा दिन जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। रामजन्मभूमि अयोध्या में तैयार हो रहे राम मंदिर में पूरी भव्यता के साथ प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। देश में उत्सव का माहौल है। इस वक्त चारों तरफ राम नाम की गूंज सुनाई दे रही है। हिंदुओं की बड़ी जीत के तौर पर देखी जा रहे राम मंदिर की स्थापना आखिर क्यों इतनी चर्चा का विषय बना हुआ है। राम मंदिर से जुड़ी पूरी गाथा बिज़नेस बाइट्स आपके लिए लाया है अपनी खास राम मंदिर का इतिहास सीरीज में.. जिसमें आपकोअयोध्या नगरी से लेकर मंदिर विवाद, निर्माण,मूर्ति स्थापना तक सारी जानकारी मिल सकेगी।

सीरीज वन में जानिए राम मंदिर के साथ कैसे जुड़ा विवाद…

इतिहासकारों के मुताबिक सन 1855 कि बात है। निर्मोही पंथ के लोगों ने तकरीबन 356 वर्ष पहले 1528 में मीर बाकी द्वारा मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाए जाने के मामले को उठाया था। जबकि मुस्लिम पक्ष इससे इंकार कर रहा था। दोनों पक्ष अपना-अपना दावा ठोक रहे थे। ये दावा बढ़ते बढ़ते मस्जिद और मंदिर का मुद्दा बन गया और दोनों पक्षों के बीच सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। उस वक्त अयोध्या अवध रियासत में शामिल थी। वाजिद अली शाह यहां के नवाब थे। बढ़ती हिंसा को देखते हुए उन्होंने जांच कमेटी बनाई। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक मंदिर – मस्जिद के खूनी संघर्ष में दस हजार से अधिक हिंदू और 60 से अधिक मुसलमान मारे गए थे। इसी हिंसा का फायदा उठाकर ब्रिटिश शासन ने अवध को अपने काबू में ले लिया।

हालांकि इतिहासकार सर्वपल्ली गोपाल ने अपनी एक किताब में इस व्याख्या को ही गलत ठहराया है। उनकी किताब ‘ एनाटोमी ऑफ़ ए कॉन्फ्रोंटेशन: अयोध्या एंड द राइज ऑफ कम्युनल पॉलिटिक्स इन इंडिया में लिखा है कि 1855 का यह विवाद हनुमानगढ़ी मंदिर को लेकर हुआ था। बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि का कोई विवाद नहीं था। मुस्लिम मानते थे कि ये असल मंदिर नहीं है बल्कि मस्जिद तोड़कर इसे बनाया गया है।

ऐसे बढ़ा विवाद


‘अयोध्या रिविजेटेड’ किताब के लेखक कुणाल किशोर लिखते हैं कि 1858 में निहंग खालसा बाबा फकीर के साथ 20 से अधिक निहंगों ने मिलकर बाबरी ढांचे में प्रवेश कर पूजा और हवन किया था। उस वक्त मस्जिद के मौजूदा मौलवी मोहम्मद असगर थे। उन्होंने इन सबके खिलाफ एफआईआर करवाई। कुणाल लिखते हैं कि एफआईआर में निहंग सिखों के खिलाफ मस्जिद से सटाकर चबूतरा बनाने का आरोप लगाया था। मस्जिद की दीवारों पर राम-राम लिखने की बात भी उन्होंने लिखी थी। राम मंदिर विवाद पर यह सबसे पहला कानूनी दस्तावेज माना गया है। इस संघर्ष में पांच साल तक अयोध्या जलती रही। विवाद का कोई हल नहीं निकला।

दोनों पक्ष अपना अपना दावा वापस लेने के लिए तैयार नहीं थे। लगातार खूनी संघर्ष जारी था। रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुओं की ओर से जारी आंदोलन का नेतृत्व साधुओं का एक वर्ग कर रहा था। निर्मोही पथ भी राम जन्मभूमि का दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं था उनका भी आंदोलन जारी रहा वहीं मुस्लिम भी अपने दावे को लेकर डटे हुए थे।

1859 में अंग्रेजों ने किया फैसला

अंग्रेजी हुकूमत के आगे किसी की नहीं चल रही थी। 1859 में ब्रिटिश हुकूमत ने पहली बार मंदिर -मस्जिद विवाद में बड़ा फैसला लिया। जन्म भूमि को उन्होंने दो हिस्सों में बांट दिया। मौके को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने मस्जिद के अंदर का हिस्सा मुसलमानों को दे दिया। जबकि हिंदुओं को बाहरी हिस्से में पूजा के लिए जगह दी गई। राम चबूतरे का रास्ता मस्जिद से अलग कर दिया गया। अब हिंदू पूर्वी और मुस्लिम उत्तरी गेट से आने जाने लगे थे। इस फैसले से विवाद और गहराने लगा था। वजह हिंदू साधुओं में इस फैसले को लेकर गहरा असंतोष था। उनका दावा था कि बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे उनके भगवान श्री राम की जन्म भूमि है। बस यही विवाद की मुख्य वजह रही।

अगली सीरीज में पढ़िए कौन था मीर बाकी, विवाद कैसे पहुंचा कोर्ट, क्या हुआ आगे?

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