रंजीता सिन्हा
देश के लगभग हर कोने से वेंटिलेटर की कमी और पीएम केयर फंड से मिले वेंटीलेटर में खराबी की ख्बरें सिलसिलेवार हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश सहित तमाम राज्यों के तमाम जनपदों के तमाम अस्पतालों में इन खबरों के साथ मरीजों की मौतों की खबरें आम हैं। आंध्र प्रदेश के तिरुपति के रुइया अस्पताल में आक्सीजन की सप्लाई में बाधा आने से 11 मरीजों की मौत हो गई। तेलंगाना के भी एक दो अस्पतालों से ऐसी खबर आई है, लेकिन प्रशासन ने पुष्टि नहीं की है। दरभंगा के अनुमंडल अस्पताल में नई चार वेंटिलेटर मशीनें जंग खा रही हैं। न जाने कहां-कहां इस तरह से मानव-वध जारी हैं। कायदे से सरकार को सार्वजनिक कर देना चाहिए कि कितने वेंटिलेटर पिछले एक साल में खरीदे गए? किस किस जिले में और कहां-कहां भेजे गए? इन वेंटिलेटर्स इंस्टाल किया गया या नहीं? ऐसे सवाल जरा पूछ कर देखिये- कई तो आपको ब्लाक कर देंगे। आप मोदी जी को लेकर सवाल कैसे कर सकते है? आप भी कहिये- सवाल का जवाब तो व्यवस्था या सरकार को देना है फिर मोदी जी को लेकर इतना इमोशनल क्यों हो रहे हैं आप?
यूपी की सीमा से सटे बिहार के सारण जिले के मांझी प्रखंड में एक पुल है जिसका नाम है जयप्रभा सेतु। यहां देखा गया है कि लोग कोविड संक्रमित शवों को नदी में फेंक रहे हैं। आए दिन एंबुलेंस से यहां शवों को लाया जाता है और फेंक दिया जाता है। स्थानीय लोगों ने कहा कि दोनों राज्यों की तरफ से लोग ऐसा कर रहे हंै। पुल के नीचे लाशों को फेंक कर भाग जाते हैं। यह भी मुमकिन है कि इतनी मौत हो गई हो कि जलाने की जगह और सामग्री कम पड़ गई हो और लोगों ने लाशों को बहा दिया हो? 1918 के स्पेनिश फ्लू के समय यही हुआ था। भारत में इतने लोग मरे थे कि लाशों से नदियां भर गई थीं। क्या 102 साल बाद हम उसी हालात में पहुंच गए है? क्या इन शवों को मरने वालों में गिना जा रहा है?
बहरहाल ताजा खबरों का जिक्र करें तो हिमाचल प्रदेश को पीएम केयर फंड से मिले 322 आइसीयू वेंटीलेटर में से 144 का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि अन्य बंद हैं। पीएम केयर फंंड से 178 पोर्टेबल वेंटीलेटर भी मिले हैं। 250 वेंटीलेटर केंद्र ने वापस मंगवा लिए हैं, इनकी जगह नए वेंटीलेटर मिलेंगे। असल में पीएम केअर्स फंड की ओर से मंगाए गए वेंटिलेटर्स की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगा है। पंजाब में उपलब्ध वेंटिलेटर्स की खराब गुणवत्ता वजह बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि ये वेंटिलेटर कुछ देर चलने के बाद बंद हो जा रहे हैं। फरीदकोट के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में आपूर्ति किए गए 80 वेंटिलेटरों में से 71 खराब हैं। ये वेंटिलेटर पीएम केअर्स फंड के तहत प्रदान किए गए थे। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि इन वेंटिलेटर्स की गुणवत्ता खराब हैं और उपयोग के दौरान एक या दो घंटे के भीतर ही बंद हो जाते हैं। एक अनेस्थेसिस्ट्स ने तो यहां तक कहा कि, कहा कि केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए भेजे गए इन वेंटिलेटरों की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि, पिछले एक साल में पीएम केयर्स फंड से सैकड़ों वेंटिलेटर उत्तर प्रदेश में जनता की जीवन रक्षा के लिए भेजे गए। इसमें से काफी इस्तेमाल भी हुए लेकिन सारे नहीं। लखनऊ से अस्सी किलोमीटर दूर कानपुर के कांशीराम अस्पताल से एक तस्वीर सामने आईं। इस अस्पताल के अंदर 6 वेंटिलेटर डिब्बे के अंदर बंद मिले, जिन्हें ना तो इस्तेमाल किया गया है और ना ही अभी कहीं और इस्तेमाल करने के लिए भेजा गया है। बलिया के अस्पताल में भी कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिली।
सच पूछिये तो कोरोना की पहली लहर के वक्त ही पिछले साल वेंटीलेटर्स को लेकर तमाम दावे किए गए। नीति आयोग के चीफ अमिताभ कांत ने 25 जून 2020 को एक ट्वीट किया, इसमें लिखा है कि भारत हर दिन 1000 वेंटिलेटर बना रहा है। जल्दी ही निर्यात करने लगेगा। बात अचरज की थी कि भारत यकायक इस स्थिति में आ गया कि वेंटिलेटर निर्यात करने लगा है? अब इसी साल के 8 मई का ट्वीट देखिये तो पाएंगे कि निर्यात का दावा करने वाले श्री कांत अब आयात की तारीफ कर रहे हैं।
जो पिछले साल जून में भारत में हर दिन 1000 वेंटिलेटर बनाने की बात कर रहे थे वो इस साल अप्रैल में विदेशी मदद के तौर पर आए वेंटिलेटर का स्वागत कर रहे हैं। अमिताभ कांत को बताना चाहिए कि हर दिन बनने वाला 1000 वेंटिलेटर कहां गया?
इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च का एक शोध पत्र है कि उस समय किए गए सबसे खराब अनुमान के अनुसार दिल्ली में 90 लाख लोगों को हल्के लक्षण वाला संक्रमण होगा और 4.5 लाख लोगों को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ेगी। सिर्फ दिल्ली के लिए यह अंदाजा था वो भी पिछले साल का। इस साल कितने लोगों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी और कितनों को मिला और कितनों को नहीं मिला जिसके कारण वे मर गए, इसकी कोई गिनती नहीं है? 24 सितंबर 2020 के इंडिया टुडे की रिपोर्ट कहती है कि सरकार ने जो डेटा जारी किया है उससे पता चलता है कि 60,948 वेंटिलेटर के आर्डर दिए गए थे। इसमें से अभी तक अलग-अलग राज्यों के सरकारी अस्पतालों में 23,699 वेंटिलेटर ही लगे हैं। इस रिपोर्ट में सरकारी डेटा लिखा है, सरकार के किस विभाग का डेटा है यह नहीं लिखा है।
क्या वास्तव में हमने पिछली लहर से कोई सबक नहीं सीखा? दुनिया के स्तर पर हमनेे देखा था कि इटली और न्यूयार्क में वेंटिलेटर की कमी के कारण कितने लोग मर गए थे। मुंबई से पिछले दिनों मिली खबर के मुताबिक, आईसीयू के 99 प्रतिशत बेड भरे हुए थे और वेंटिलेटर के 94 प्रतिशत बेड भरे हुए थे। यह 13 जून 2020 की यह रिपोर्ट है। अगर हम मुंबई में वेंटिलेटर औऱ आईसीयू की तंगी से सतर्क हुए होते तो शायद आज कई लोगों की जान बच जाती। यही नहीं एक खबर के अनुसार जून 2020 तक आते आते वेंटिलेटर पर जाने वाले मरीजों की संख्या 0.33 से बढ़ कर 4.16 प्रतिशत हो चुकी थी। लिहाजा कोई बहाना चल ही नहीं सकता कि वेंटिलेटर की तैयारी इसलिए पर्याप्त नहीं हुई कि जरूरत नहीं थी।
हम जानते हैं और समझते हैं कि आप बहुत ज़्यादा वेंटिलेटर नहीं लगा सकते लेकिन दक्षिण कोरिया जिसकी आबादी भारत से बहुत कम है उसके पास भारत से ज्यादा वेंटिलेटर हैं। जरा सोचिए हमारे यहां वेंटिलेटर की कितनी कमी है। पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव ने पिछले साल ही यह बात अपने लेख में लिखा था- वेंटिलेटर कितना हो इस पर बहस हो सकती है लेकिन एक दम से न हो, इतना कम हो कि लोग दम तोड़ दें क्या इस पर बहस नहीं होनी चाहिए?
बहरहाल, कोरोना संक्रमण मरीज के जीवन पर एक एक सांस भारी पर रहा है। जीवन रक्षक वेंटिलेटर नहीं मिलने के कारण कई मरीजों की मौत हो रही है, लेकिन यहां तो जीवन देने वाली मशीन की ही मौत होती दिखाई दे रही है। संसाधन और मैनपावर की कमी के साथ-साथ दृढ़इच्छा शक्ति की कमी के कारण लाखों की मशीनें बर्बाद हो रही हैं और मरीजों की मौत का ग्राफ श्मशान में ऊंचाा होता जा रहा हैं। हां, नदी में बहते शवों की लिखा-पढ़ी में हेराफेरी आसान है।

