Site icon Buziness Bytes Hindi

आजादी के 75 वर्ष पर विशेष ———–

मेरठ की 1857 की क्रांति ने देशवासियों के दिलों में देशभक्ति की वो ज्वाला जलाई थी जो कि 19 वे दशक में भी धधकती रही थी। देशभक्ति की ये ज्वाला हिंदू मुस्लिम ही नहीं बल्कि महिलाओं के भीतर भी धधकती रही। इन्हीं में से एक मुस्लिम महिला थी हजरा बेगम। जिनका मेरठ से बड़ा करीबी नाता रहा है। हजरा बेगम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन की पूर्व महासचिव थीं। उनका जन्म रामपुर के एक धनी परिवार में हुआ था। हजरा बेगम के पिता मेरठ में मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात थे। हजरा मशहूर दिग्गज अभिनेत्री जोहरा सहगल की बहन हैं। हजरा बेगम ने अपने चचेरे भाई से शादी की, लेकिन जल्द ही उन्होंने उसे तलाक दे दिया और अपने नवजात बेटे के साथ अपने पिता के घर लौट आई।  मेरठ हजरा बेगम को बहुत अच्छा लगता था। क्योंकि यहां पर उस दौर में 1857 की क्रांति के किस्से गूंज रहे थे। हजरा बेगम मेरठ की इस क्रांति से प्रेरित हुईं। इसके बाद जब उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट नेतृत्व को उनके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा तो इससे और अधिक प्रेरित हुई। हजरा बेगम 1933 में अपने बेटे के साथ ग्रेट ब्रिटेन गई। जहां उन्होंने मोंटेसरी शिक्षण पाठ्यक्रम का अध्ययन किया।

Read also: Maharashtra Politics: महाराष्ट्र में मंत्रियों के बीच विभागों का बटवारा, फडणवीस संभालेंगे गृह और वित्त मंत्रालय

ब्रिटेन में अपनी पढ़ाई के दौरान ही वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। उस दौर में किसी राजनैतिक पार्टी में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिलाओं में से एक थीं। वहां वह भारतीय मार्क्सवादी छात्रों के समूह का हिस्सा थीं। 1935 में, उन्होंने सोवियत संघ का दौरा किया और केएम अशरफ, जेडए अहमद और सज्जाद जहीर के साथ वापस भारत लौट आई।  भारत लौटने के बाद, उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कैडर जेडए अहमद से शादी कर ली। वह इलाहाबाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय रूप से शामिल थीं और जेडए अहमद, राममनोहर लोहिया और केएम अशरफ के साथ पार्टी के युवा नेताओं के मुख्य समूह का हिस्सा बन गईं। बाद में, वह 1940 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की आयोजन सचिव बनीं। जहाँ उन्होंने इसके मुखपत्र रोशनी का संपादन किया और साप्ताहिक कौमी जंग में भी योगदान दिया। 1949 में उन्हें पांच महीने की कैद भी हुई और रिहा होने के बाद भूमिगत हो गईं।  1952 में, उन्होंने वियना में विश्व शांति सम्मेलन में भाग लिया।  लंबी बीमारी के बाद 20 जनवरी 2003 को उनका निधन हो गया।

Exit mobile version