किसानों ने ही खत्म कर दिया किसान आंदोलन!

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किसानों ने ही खत्म कर दिया किसान आंदोलन!

  • हिंसक, अराजक और नेतृत्वविहीन आंदोलन करने की इजाजत मिलना मुश्किल
  • किसान नेताओं के सामने बड़ा सवाल, खुद को बचायें या आंदोलन चलायें

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। दिल्ली में अपनी ताकत दिखाने के जोश में हिंसा करने वाले किसानों ने खुद ही अपना किसान आंदोलन खत्म करने की शुरूआत कर दी। क्योंकि दिल्ली में हुई जो हिंसा आज देश ही नहीं बल्कि दुनिया ने देखी है उसको देखते हुए यह आंदोलन अब हिंसक, अराजक और नेतृत्वविहीन आंदोलन बन गया है जिसे चलाये रखने की इजाजत कोई नहीं देगा। वहीं आंदोलन के हिंसक होते ही उग्र किसानों से पल्ला झाड़ने वाले किसान नेता अब खुद को बचाने की जुगत लगाने में जुट जायेंगे। अब किसान आंदोलन को राजनीतिक दलों का समर्थन मिलना भी असंभव दिखाई दे रहा है। ऐसे में इस किसान आंदोलन के आगे चलने की संभावनाएं बेहद मुश्किल दिखाइ दे रही है। आइये जानते हैं कि आखिर क्या गलतियां रहीं किसान आंदोलन मैं और कैसे संभावना बन रही है आंदोलन के खत्म होने की…

शक्ति प्रदर्शन का दिन गलत, जगह गलत
कृषि कानूनों के विरोध में अब तक शांतिपूूर्वक धरने पर बैठे किसानों ने केंद्र सरकार को अपनी ताकत दिखाने के लिये 26 जनवरी का दिन और प्रदर्शन का केंद्र दिल्ली इसलिये चुना कि इस दिन दुनिया की निगाह भारत पर होगी और दिल्ली में तमाम वीआईपी मौजूद होंगे। किसान नेताओं का मानना था कि इस दिन उन्हें और अधिक मीडिया कवरेज मिलेगी और वह दुनिया के सामने शक्ति प्रदर्शन करने और अपनी मांग उठाने में कामयाब होंगे। लेकिन आज जो कुछ हुआ उसका अंदाजा उन्हें भी नहीं था। किसानों के इस बलवे से जो दुनिया भर में भारत की बदनामी हुई है उससे देश की जनता किसानों के खिलाफ हो गयी है। ऐसे में किसान आंदोलन को भविष्य में आम आदमी का समर्थन मिलना मुश्किल होगा। वहीं अब तक शांत रहकर किसानों को सहयोग कर रही पुलिस का सहयोग मिल पाना भी संभव नहीं होगा। इस शर्मनाक घटना से अब तक उनके साथ खड़ा मीडिया भी खिलाफ हो गया है। क्योंकि हम जैसे भी सही अपने देश और देशभक्ति पर आंच नहीं आने दे सकते। देश के गौरव और तिरंगे का अपमान सहन करना शायद ही किसी के लिये संभव हो।

सरकार को दिया कार्रवाई का मौका
केंद्र सरकार द्वारा ट्रैक्टर मार्च की अनुमति दिये जाने के बाद किसानों को ऐतिहासिक और शांतिपूर्वक मार्च निकालना चाहिये था। मगर दंगाईयों के इस शर्मनाक कृत्य के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में आ गयी है। अब केंद्र सरकार इस मामले में जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने के साथ मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जा सकती है। कोर्ट के समक्ष दंगे के फोटो-वीडियो प्रस्तुत कर इस आंदोलन को किसान नेताओं के हाथ से निकल जाने की बात आसानी से साबित कर सकती है। ऐसे में शांतिपूर्ण आंदोलन की इजाजत देने वाली सुप्रीम कोर्ट भी शायद ही किसानों को राहत दे पाये। और यदि आंदोलन की अनुमति दी भी गयी तो उसे इतने प्रतिबंधों को सामना करना पड़ेगा जिनका पालन करते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाना बेहद मुश्किल होगा। वहीं उपद्रवियोें और ट्रैक्टर मार्च की जिम्मेदारी लेने वाले किसान नेताओं पर भी कार्रवाई अवश्य होगी। ऐसे में किसान नेताओं के सामने खुद को बचाने या आंदोलन आगे बढ़ाने का रास्ता चुनने की मजबूरी होगी। ऐसे में उनके लिये एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई की स्थिति का सामना करना बेहद मुश्किल होगा। क्योंकि वह इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि यदि इतनी संख्या में बुलाने की हिम्मत रखते हैं तो संभालने की काबिलियत भी रखिये। वहीं अब तक आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे किसान भी अपनी छवि खराब हो जाने के बाद शायद ही पहले जैसी संख्या में जुट पायेंगे। सरकारी एजेंसियों की कड़ी निगरानी के बाद किसान आंदोलन को आर्थिक सहयोग भी पहले की तरह प्राप्त हो पाना मुश्किल होेगा।

उपद्रवी नहीं हैं किसान, राजनीतिक दलों ने झाड़ा पल्ला
किसानों का आंदोलन हिंसक होते ही राजनीतिक दलों और नेताओें ने इससे पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है। राहुल गांधी जहां कह रहे हैं कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं, वहीं शिवसेना के संजय राउत इससे राष्ट्रीय शर्म का दिन बता रहे हैं। अब तक किसानों का आदर-सत्कार करने वाली दिल्ली की प्रदेश सरकार भी अब हाथ खींच सकती है। क्योंकि दंगाईयों के इस आतंक के बाद उन्हें समर्थन देकर दिल्ली और देश की जनता के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत शायद ही आप सरकार दिखा पाये। वहीं पहले हिंसा की जानकारी होने से इनकार करने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने भी उपद्रवियों को किसान मानने से इंकार कर दिया। संयुक्त किसान मोर्चा ने भी उपद्रव करने वालों से पल्ला झाड़ लिया है। ऐसे में आने वाले दिन नेताओं के खुद को पाक-साफ करने में ही गुजरने वाले हैं। ऊपर से सरकारी कार्रवाई भी उनपर होना तय माना जा रहा है। इन हालातों में आंदोलन का नेतृत्व करने की हिम्मत भी शायद ही कोई कर पाये। और बिना नेतृत्व और राजनीतिक समर्थन के इस आंदोलन को आगे चलाना शायद ही संभव होगा। यह अभी आंकलन हैं और आने वाली तस्वीर भी एक-दो दिन में सामने आ जायेगी। मगर जो हालात हैं और देश भर में इस शर्मनाक घटना के विरोध में लोगों में आक्रोश है और राजनीतिक दलों सहित किसान नेता भी जिस प्रकार घटनाक्रम से पल्ला झाड़ रहे हैं ऐसे में आंदोलन को आगे चलाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य होगा।

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