Supreme Court: कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट के क्या हैं मायने

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Supreme Court: कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट के क्या हैं मायने

लखनऊ। केंद्र सरकार की ओर से रद्द किये जा चुके कृषि कानूनों को क्या एक बार फिर से लागू किया जाएगा? यह सवाल अब उठने लगा है। यूपी चुनाव के दौरान किसान संगठनों और राजनेताओं ने लगातार जनता से कहा कि अगर भाजपा जीती तो कृषि कानून लागू किये जाएंगे। यूपी में प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी सत्ता में आ चुकी है। ऐसे में एक बार फिर कृषि कानूनों को लागू किये जाने का मामला तूल पकड़ रहा है। लेकिन यह इसलिए नहीं कि यूपी में बीजेपी की जीत हुई है, बल्कि इस तूल के पीछे है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) द्वारा बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट। इस कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी है, वो चौंकाने वाली है। करीब एक साल की लंबी लड़ाई और सैकड़ों किसानों की शहादत के बाद खत्म किये गये कानूनों को लेकर इस कमिटी ने दावा किया है कि इससे करीब 86 फीसदी से ज्यादा किसान संगठन खुश थे। ऐसे में अब इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या एक बार कृषि कानूनों को लागू किया जाएगा। हालांकि किसान संगठनों का कहना है कि कानून को फिर से वापस लाया गया तो यह सरकार की वादाखिलाफी होगी और इसके खिलाफ आंदोलन किया जाएगा।

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ये है कमेटी की रिपोर्ट

कृषि कानूनों (Agricultural laws) से नाराज किसानों का संगठन सुप्रीम कोर्ट गया था। जहां पर याचिका की सुनवाई करते हुए जमीनी सच जानने के लिए कमिटी बनाई थी। जिसमें कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, शेतकारी संगठनों से जुड़े अनिल धनवत और प्रमोद कुमार जोशी को शामिल किया गया था। इस कमिटी ने मार्च में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी, जिसमें सरकार को कानूनों से जुड़े कई सुझाव भी दिये गये थे। तब एक सदस्य ने दावा किया था कि कानूनों को वापस लेने से खेती पर नकारात्मक असर होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के एक पैनल ने रिपोर्ट को लेकर बड़ा दावा किया है, जिसके अनुसार करीब 86 फीसदी से ज्यादा किसान संगठन सरकार के इन कानूनों से खुश थे। यह दावा किया गया है कि जो किसान संगठन खुश थे, वो करीब 03 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार देश में करीब 14.5 करोड़ किसान हैं।

सवालों का दौर शुरू

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) की कमेटी की इस रिपोर्ट के बाद अब सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या एक बार फिर से कृषि कानूनों को लागू किया जा सकता है? इसका जवाब मुश्किल है। लेकिन, कमेटी की रिपोर्ट के दूसरे पहलुओं पर नजर डालें तो भले ही जो 86 फीसदी किसान संगठन खुश बताये जा रहे हैं, उनके प्रतिनिधित्व में मात्र 03 करोड़ ही किसान हैं, जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में करीब साढ़े 14 करोड़ किसान हैं। ऐसे में संगठनों के बजाय आबादी के नजरिये से देखें तो करीब 11 करोड़ से ज्यादा किसानों की आबादी खुश वाली श्रेणी में नहीं है।

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क्या हैं कमेटी के प्रस्ताव

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) की इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि फसल खरीदी और अन्य विवादित मामलों को सुलझाने के लिए वैकल्पित व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके लिए किसान अदालत जैसी व्यवस्था बनाई जा सकती है। साथ ही खेती के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए एक बॉडी बनाई जा सकती है। इसके अलावा किसान और कंपनी के बीच एग्रीमेंट बने और उसमें गवाह किसानों की ओर से हो। अगर कांट्रैक्ट के मुताबिक तत्कालीन व्यवस्था में वस्तु की कीमत ज्यादा हो तो इसकी समीक्षा की जाए। इसके अलावा सरकार की ओर से तय कीमत का प्रचार-प्रसार किया जाए। ताकि, किसान अपडेट रहें।

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