कश्मीर फाइल्स से लखीमपुर फाइल्स तक

फीचर्डकश्मीर फाइल्स से लखीमपुर फाइल्स तक

Date:


कश्मीर फाइल्स से लखीमपुर फाइल्स तक

अमित बिश्‍नोई

देश में इन दिनों एक फिल्म की ज़बरदस्त चर्चा है, नाम है ‘द कश्मीर फाइल्स ‘ (The Kashmir Files). फिल्म को कश्मीर से पंडितों के पलायन पर आधारित बताया जा रहा है. फिल्म की ब्रांडिंग के लिए जहाँ फिल्म से जुड़े कास्ट एंड क्रू लगे हुए हैं वहीँ प्रधानमंत्री मोदी समेत पूरी भारतीय जनता पार्टी भी इस फिल्म के प्रमोशन में लगी हुई. भाजपा शासित कई राज्यों में तो फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया गया है वहीँ कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मांग है कि केंद्र सरकार इस फिल्म से GST हटाए। वहीँ इन सबके बीच समाजवादी पार्टी के मुखिया ने “लखीमपुर फाइल्स” की बात छेड़ इस चर्चा को एक नया रूप देने की कोशिश की है.

Read also: छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री देखेंगे कश्मीर फाइल्स; सभी विधायकों को फिल्म देखने का दिया आमंत्रण

इसमें अब कोई शक नहीं कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) अब फिल्म के बजाय एक राजनीतिक मुद्दा बन गयी या कह सकते हैं कि बनाई गयी है । प्रधानमंत्री मोदी जी पांच राज्यों के चुनाव में मिली कामयाबी और संसद सत्र से पहले पार्टी की एक बैठक में जब “द कश्मीर फाइल्स” की चर्चा करते हैं और कहते हैं कि ऐसी फिल्में बननी चाहिए ताकि लोगों को सच्चाई पता लगे. प्रधानमंत्री जी इस फिल्म का विरोध करने वालों या आलोचना करने वालों को भी आड़े हाथो लेते हुए अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात उठाते हैं, उनका यह कहना कि जिनको लगता है इस फिल्म में कुछ गलत दिखाया गया है तो अपनी अलग फिल्म बनाएं, उन्हें किसी ने रोका नहीं है. कहने का मतलब प्रधानमंत्री और पूरी भाजपा जिस तरह इस फिल्म के पीछे खड़ी हुई नज़र आ रही है, उसके बाद तो इसपर राजनीतिक बवाल मचना लाज़मी ही हो गया.

कांग्रेस पार्टी कश्मीर से पंडितों के पलायन के लिए तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार और उसको समर्थन दे रहे भाजपा के 85 सांसदों और कश्मीर के उस समय के गवर्नर जगमोहन जिनका सम्बन्ध आरएसएस से बताया जाता है को ज़िम्मेदार मानती है वहीँ भाजपा इस सबके पीछे कांग्रेस को प्रोजेक्ट करना चाहती है. मंशा साफ़ है कि तैयारी 2024 की अभी से हो रही है, दोनों मुख्य राजनीतिक दल इस मसले पर एक दूसरे को अपने तर्कों से घेर रहे हैं. भाजपा इस फिल्म के प्रोडक्शन में किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ़ इंकार कर रही है यह अलग बात है कि फिल्म से जुड़े अधिकांश कलाकारों और फिल्मकारों का भाजपा से गहरा रिश्ता है, इसलिए इस सवाल को बेमानी नहीं कहा जा सकता। फिल्म प्रमाणिक तथ्यों पर आधारित है या नहीं यह चर्चा का अलग विषय है मगर इस फिल्म ने राजनीति करने का एक नया माध्यम ज़रूर खोल दिया है और शायद यही वजह है कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव (SP supremo Akhilesh Yadav) के मुंह से यह निकला कि जब कश्मीरी पंडितों के पलायन के मुद्दे पर फिल्म बन सकती है तो लखीमपुर में एक मंत्री पुत्र द्वारा निर्दोष किसानों पर गाड़ी चढ़ाये जाने की घटना पर फिल्म क्यों नहीं बन सकती?

Read also: अखिलेश यादव के लिए आगे का रास्ता चुनौतियों से है भरा

अब सवाल यह है कि क्या वाक़ई लखीमपुर हत्याकांड (Lakhimpur Incident) पर कोई फिल्म बनेगी, क्या अखिलेश यादव “लखीमपुर फाइल्स को अमलीजामा पहनाएंगे? क्या देश की राजनीति में नए फ़िल्मी ट्रेंड का आगाज़ हो चूका है और आने वाले दिनों में यह ट्रेंड और तेज़ होगा और राजनीतिक पार्टियां अपने अनुकूल विषयों पर बनने वाली फिल्मों को प्रोत्साहित करेंगी? देश में मौजूदा समय में कई फिल्में ऐसी बनी हैं जो सरकार और समाज को कटघरे में खड़ा करती हैं लेकिन “द कश्मीर फाइल्स” को जिस तरह का प्रचार और समर्थन एक राजनीतिक पार्टी की ओर से मिल रहा है वह अपने आप में एक सवाल है. सरकार और समाज को कटघरे में खड़ा करने वाली उन फिल्मों पर चर्चा क्यों नहीं हुई, क्यों उन्हें टैक्स फ्री नहीं किया गया, क्यों उनके लिए किसी राजनीतिक पार्टी ने सिनेमाहाल बुक नहीं कराये। क्या इसलिए कि उन फिल्मों से किसी ख़ास राजनीतिक दल को कोई फायदा नहीं मिलता। नफा और नुकसान का दूसरा नाम बनती जा रही सियासत में इस तरह की फिल्मों का नया दौर शुरू होने वाला है. आज “द कश्मीर फाइल्स” बनी है, कल “लखीमपुर फाइल्स” बनेगी। आगे और न जानें कितनी ऐसी फाइलों का जन्म होगा यह तो समय ही बताएगा।

कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandits) का पलायन हो या लखीमपुर में किसानों पर गाड़ी चढ़ाना, दोनों ही घटनाओं में मानवता की बलि चढ़ी है, फिल्म भले ही बन गयी है मगर तीस बरस से ज़्यादा हो गये हैं मगर कश्मीर छोड़कर आये 60 हज़ार परिवार आज भी निर्वासित हैं. इस दौरान कितनी सरकारें आईं और गयीं मगर इन्हें सिर्फ सहानुभूति मिली, न्याय नहीं, यह आज भी कश्मीर वापस जाने की राह देख रहे हैं, इसी तरह किसानों पर अत्याचार हुआ, वह न्याय की राह देख रहे हैं, इस चुनाव में उनपर खूब सियासत हुई, सहानुभूति भी मिली, आर्थिक मदद भी मिली, हो सकता है फिल्म भी बन जाय मगर इन्साफ मिलेगा या नहीं यह सबसे बड़ा सवाल है.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related