जेल जाने और वोट बैंक खिसकने का डर

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जेल जाने और वोट बैंक खिसकने का डर

सपा बसपा की कांग्रेस पर हमलों की यह है मजबूरी

उबैदउल्लाह नासिर

जेल जाने और वोट बैंक खिसकने का डर
उबैदउल्लाह नासिर

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी द्वारा कोरोना समस्या और लाकडाउन के कारण प्रवासी मजदूरों के पलायन और उससे उपजी आर्थिक समस्या पर विचार विमर्श करने के लिए विपक्षी पार्टियों की बुलाई गई बैठक से आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के गायब रहने से आम आदमी को भले ही अचरज हुआ हो लेकिन इन पार्टियों के सियासी खेल और इनके नेताओं के दोहरे डर को जानने वालों को इस पर कोई आश्चर्य नहीं है I सब से पहले बात करते हैं आम आदमी पार्टी की जिस ने दिल्ली असम्बली के चुनाव में बीजेपी को दो बार करारी शिकस्त दी लेकिन इस बार के चुनाव के खत्म होते ही गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लिया है यहाँ तक की वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले और मोदी सरकार और उनकी कार्यशैली की आलोचना करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने कोरोना महामारी और लाकडाउन को लेकर मोदी की प्र्शंसा कर रहे हैं जबकि दुनिया कह रही है कि बिना विचार किये गए लाकडाउन के कारण ही प्रवासी मजदूरों की समस्या और अन्य समस्याएं उत्पन्न हुई | यही नहीं दिल्ली के दंगों, जो दंगे नहीं बल्कि संघी गुंडों और दिल्ली पुलिस की मुसलमानों के खिलाफ संयुक्त कारवाई थी जिसमें गर्भवती सफूरा जरगर समेत न जाने कितने मुस्लिम नवजवान लड़के लड़कियों आदि की अंधाधुंध गिरफ़्तारी की गयी उस पर भी उन्होंने मुंह नही खोला इतना ही नहीं जब उनके ही एक बड़े नेता दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वरिष्ट पत्रकार डॉ ज़फरुल इस्लाम खान को उनके एक tweet के कारण गलत तरीके से FIR लिख कर उनपर देशद्रोह की धारा तक लगा दी गई तो भी केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के किसी नेता ने इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई I केजरीवाल के इस यू टर्न से बहुतों को आश्चर्य हो रहा होगा लेकिन लोग जानते है कि केजरीवाल अन्ना मूवमेंट से निकले नेता है और यह सारा मूवमेंट आरएसएस की साज़िश /खेल था I

अब आते हैं उत्तर प्रदेश की राजनीति पर यहाँ की दोनों मुख्य विपक्षी पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी सोनिया गांधी की बुलाई मीटिंग का बहिष्कार किया था I समाजवादी पार्टी के पितामाह मुलायम सिंह यादव लोहियावादी है और लोहियावाद का मुख्य सिद्धांत कांग्रेस का विरोध है उनकी नज़र में कांग्रेस आरएसएस से भी बुरी पार्टी है I सत्तर की दहाई में राम मनोहर लोहिया जी ने गैर कांग्रेसवाद के सिद्धांत पर सभी विरोधी पार्टियों को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर संयुक्त विधायक दल का गठन किया था जिसमें पहली बार आरएसएस की सियासी शाखा जनसंघ को पहली बार न केवल स्वीकार्यता और सम्मान मिला बल्कि सत्ता में हिस्सा भी मिला उसके बाद से उसने कभी पीछे मुड़ आकर नहीं देखा और सियासी झंझावतों को झेलते हुए आज इस मुकाम पर पहुँच सकी है| ज़ाहिर है मुलायम सिंह यादव भी कांग्रेस को अपना पहला विरोधी मानते हैं दूसरे उनके मुस्लिम यादव गठजोड़ का सब से महत्वपूर्ण हिस्सा प्रदेश के लगभग 20% मुस्लिम वोटर हैं जो नब्बे की दहाई तक कांग्रेस की सब से बड़ी सियासी ताक़त थे मुलायम सिंह जानते हैं कि अगर कांग्रेस मज़बूत हुई और उसका मुस्लिम वोटर उस तरफ खिसक गया तो अपने 7% यादव वोटरों के सहारे वह फिर सियासी वनवास में चले जायेंगे I ध्यान रहे कि 2017 के उत्तर प्रदेश असेम्ब्ली के चुनाव में जब अखिलेश ने कांग्रेस से समझौता आकर लिया था तो मुलायम सिंह ने इसका खुलकर विरोध किया था, इसी तरह स्व कांशी राम और मायावती ने बड़ी मेहनत से कांग्रेस के दूसरे दलित वोट बैंक पर क़ब्ज़ा किया था I कांग्रेस ने दलित मुस्लिम और ब्राह्मण वोटरों का जो पिरामिड तैयार किया था वह मुस्लिम और दलित वोटरों के चले जाने से कमज़ोर हुआ तो ब्रहमण भी उससे विमुख होकर बीजेपी में चले गए और कांग्रेस पूरी तरह सियासी वनवास में चली गयी यहाँ तक 2017 में उत्तर प्रदेश अस्म्बली में उसके विधायको की संख्या मात्र 7 रह गयी लेकिन यहाँ कांग्रेस ने प्रदेश में एक ऐसा जुझारू नेतृत्व दिया जो चौथे नम्बर की सियासी ताकत होते हुए भी पहले नम्बर की विपक्षी पार्टी बन गयी| प्रियंका गांधी वाड्रा को महासचिव इंचार्ज और अजय कुमार लल्लू जैसे जुझारू और ज़मीनी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और उसके बाद से अब तक कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मोदी योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सड़क पर उतर कर संघर्ष शुरू किया| मंहगी बिजली और पेट्रोलियम पदार्थों का मामला हो या सोनभद्र में आदिवासी किसानो पर अत्याचार या और कहीं भी पुलिसिया दमन, कांग्रेस इन सबके खिलाफ सड़क पर उतरी| नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन पर जिस प्रकार उत्तर प्रदेश पुलिस ने दमन और अत्याचार की सब हदें पार कर दीं उसके खिलाफ सब से मुखर आवाज़ प्रियंका गांधी की ही रही जबकि अखिलेश और मायावती केवल tweet तक ही सीमित रहे I

कोरोना महामारी लाकडाउन और विस्थापित मजदूरों के मामले में भी प्रियका गांधी और कांग्रेस ने बाज़ी मार ली| इन मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए प्रियंका गांधी ने 1000 बसें भेजीं और जिस प्रकार योगी सरकार ने उन्हें वापस ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस के नेतृत्व पर मुक़दमा भी दर्ज कराकर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह को अभियुक्त बनाया और अजय कुमार लल्लू को गिरफ्तार कर लिया उसकी मीडिया समेत समाज के सभी वर्गों में कड़ी आलोचना हुई लेकिन मायावती ने बीजेपी और योगी सरकार के बजाय कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर के खुद को हँसी का पात्र बना लिया है I वरिष्ट पत्रकारों, बुद्धजीवियो, राजनैतिक विश्लेषकों और आम आदमी का भी यही कहना है कि दोनों पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार और आय से अधिक सम्पति के मामले में ED और CBI के अभियुक्त हैं और सिर्फ मोदी/योगी सरकार की मेहरबानी से जेल जाने से बचे हुए हैं ज़ाहिर है वह इन्हें नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते दूसरे दोनों नेता यह भी नहीं चाहेंगे की कांग्रेस प्रदेश में मज़बूत हो क्योंकि यदि कांग्रेस मज़बूत हुई तो इनका सियासी ग्राफ पाताल में चला जाएगा अर्थात निजी और सियासी कारणों से इन तीनो पार्टियों आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का कांग्रेस से न केवल दूरी बनाए रखना बल्कि उसे कमज़ोर करते रहना भी आवश्यक है बहरहाल जनता सब कुछ देख समझ रही है इनकी यह सियासी बिसात इन्हें शह देगी या मात यह 2022 के असम्बली चुनाव में सामने आ जायेगा लेकिन यह सच है की फिलहाल तो कांग्रेस ने बहुत बढ़त ले रखी है I

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