अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का रंग अब धीरे धीरे गहरा होता जा रहा है, राजनीतिक गुणाभाग के बीच सियासी दलों ने अपनी पार्टी, अपने गठबंधन को मज़बूत करना शुरू कर दिया है. गठबंधन की अगर बात करें तो इस चुनाव में सबसे ज़्यादा चर्चा में सपा और रालोद का गठजोड़ है और रालोद की अगर बात करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जाट, किसान और चौधरी चरण सिंह व चौधरी अजित सिंह की विरासत संभालने वाले जयंत चौधरी का नाम आना लाज़मी है.
एक समय था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी परिवार का काफी दबदबा था. जनता पार्टी से लोकदल और फिर लोकदल से राष्ट्रीय लोकदल के रूप में चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजीत सिंह से लेकर अब जयंत चौधरी तक नेतृत्व का सफर जारी है. लेकिन यह सच है कि जयंत चौधरी को एक लुटा पिटा कारवाँ मिला है जिसे फिर खड़ा करने की ज़िम्मेदारी जयंत चौधरी के कांधों पर है और 2022 के विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी की पहली असली परीक्षा भी.
पिछले विधानसभा चुनाव में रालोद एकमात्र सीट पर ही कामयाबी मिली थी। यूपी असेंबली के चुनाव में यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन था. 2012 में यूपीए के साथ गठबंधन में उसे 9 सीटों पर जीत मिली थी और उससे पहले उसके पास 10 सीटें थी.
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कहने का मतलब यह है जयंत चौधरी को एक नए सिरे से शुरुआत करनी है. युवा और पढ़े लिखे नेता हैं, नए विचार हैं, नयी शैली है और सबसे बढ़कर खानदानी राजनेता हैं। बचपन से ही सियासत के दांव पेचों को देखते-सुनते और समझते आ रहे हैं, यानी पढ़े भी हैं और गढ़े भी हैं तभी तो वह परिपाटी तोड़ने की बात भी करते हैं. जयंत का मानना है सियासी पार्टियां पार्टी के घोषणा पत्र को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं रहतीं, आम तौर पर चुनाव प्रचार शुरू होने के बाद और कभी कभी तो एक दो दौर के बाद घोषणापत्र घोषित होता है. जनता को घोषणा पत्रों के बारे में पता ही नहीं चल पाता और कुछ लोगों को जबतक पता चलता है, चुनाव समाप्त हो चुका होता है. इसलिए रालोद इस बार पहले घोषणा पत्र जारी करेगी फिर चुनाव प्रचार में उतरेगी।
रणनीतिक तौर पर जयंत चौधरी अपनी कुशलता का परिचय त्रिस्तरीय पंचायत में अच्छी तरह से दे चुके हैं और पार्टी को कामयाबी भी दिलाई है. जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में जब भाजपा साम दाम दण्ड भेद यानी हर जायज़ नाजायज़ तरीका इस्तेमाल कर रही थी तब बाग़पत को भाजपा के पंजे से जयंत ने बचा लिया, हालाँकि इस मामले में समाजवादी पार्टी बेबस नज़र आयी जो गठबंधन में उसके बड़े भाई की भूमिका में है.
जैसा कि हमने पहले कहा कि एक युवा और नयी पीढ़ी के नेता होने नाते उनकी सोच भी नयी है. जयंत जितनी सक्रियता से क्षेत्र के लोगों और किसानों के बीच खुद जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं उतना ही सरगर्मी से वह सोशल मीडिया पर भी सक्रीय रहते हैं और लगातार केंद्र हो या प्रदेश सरकार, हर मुद्दे पर घेरते नज़र आते हैं. जंतर मंतर पर जब बेरोज़गार नौजवानों पर लाठियां बरसती हैं तो उनका फ़ौरन ट्वीट आता है जिसमें सरकार के लिए एक चेतावनी होती है “युवा करवट ले रहे हैं सत्ताधारी होशियार!”. पंजाब सरकार जब गन्ने का मूल्य बढ़ाती है तो वह योगी जी को जागने की सलाह देते हैं. वह लगातार किसानों के जागने की बात करते हैं.
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बात किसान की हो तो रालोद का नाम आना स्वाभाविक है, कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. पिछले चुनाव में भाजपा ने बड़ी कामयाबी से किसानों और रालोद के बीच ध्रूवीकरण का खेल खेलकर दरार डाल दी थी. किसान भले ही मन से रालोद से दूर न हुआ हो मगर उसने खुले तौर वोट भाजपा को ही दिया। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान अपने उस फैसले पर पछता रहा है और यह बात पूरी तरह से जयंत चौधरी के फ़ेवर में जा रही है. जयंत भी जानते हैं कि किसान उसके राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और यही वजह है कि अपना घोषणापत्र बनाने के लिए वह गाज़ीपुर-दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों से जाकर मिलते हैं और उनसे मेनिफेस्टो के लिए सलाह मांगते हैं. वह किसानों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करने की कोशिश करते हैं. कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन रालोद के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं।
जयंत चौधरी को अच्छी तरह मालूम है कि किसान आंदोलन न सिर्फ उनको पुरानी पहचान दिला सकता है बल्कि उनकी बार्गेनिंग पावर भी बढ़ा सकता है. भले ही समाजवादी पार्टी से रालोद का गठबंधन लगभग फाइनल हो चूका हो , दोनों पार्टियों के नेता विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर इस गठबंधन को स्वीकार भी कर चुके हों मगर सीटों के बारे में अभी फैसला नहीं हुआ है. हालाँकि चुनाव को अभी कई महीने बाक़ी हैं फिर भी जयंत चौधरी की कार्यशैली को अगर देखें तो वह अपने मेनिफेस्टो की तरह अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा भी सबसे पहले ही करना चाहेंगे। 2017 में रालोद ने अकेले चुनाव लड़ा था, इसबार रालोद सपा से गठबंधन में हैं तो देखना होगा कि कितनी सीटों पर समझौता होता है और यह भी देखना होगा कि बार्गेनिंग पावर बढ़ने का जयंत को कितना फायदा होगा।

