अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश की चुनावी सरगर्मियां इन दिनों अपने चरम पर हैं, पहले चरण का मतदान बस कुछ ही चरण दूर है. आरोप प्रत्यारोपण, दोषारोपण, तेरी कमीज मेरी कमीज से मैली या मेरी कमीज तेरी कमीज से साफ़ का दौर चल रहा है. एक दूसरे के सत्ताकाल की कुरीतियों को बढ़ा चढ़कर पेश किया जा रहा है. और इन्हीं में है एक कुरीति है अपराध। बोले तो अपराधी या माफिया। इस विषय को लेकर सबसे मुखर सत्ताधारी भाजपा है जो मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी पर लगातार हमले कर रही है और समाजवादी पार्टी को अपराध का पर्याय बता रही है।
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देश के गृह मंत्री कहते है कि अपराधियों, माफियाओं का अब एक ही ठिकाना है, वह या तो जेल में हैं या फिर सपा के संरक्षण में हैं, अमित शाह जी को दूरबीन लगा कर भी अपराधी नज़र नहीं आते, ऐसा ही दावा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भी करते हैं. वह भी कहते हैं कि जब किसी अपराधी या माफिया पर कार्रवाई होती है तो अखिलेश यादव के पेट में दर्द उठता है, योगी जी ने तो सपा को गुंडे माफियाओं की पार्टी का नाम भी दे दिया है. मगर भाजपा के यह धुरंधर नेता जब इस तरह की बातें करते हैं तो वह शायद अपने गिरेहबान में झांकना भूल जाते हैं।
भारतीय जनता पार्टी अपराधियों से कितना मुक्त है इसकी झलक तो पहले चरण के चुनाव में उसके उम्मीदवारों के हलफनामों से ही मिलती है. अगर भाजपा के 57 उम्मीदवारों के हलफनामों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि 29 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं यानि 50 प्रतिशत से ज़्यादा और इनमें लगभग 40 प्रतिशत पर गंभीर अपराध दर्ज हैं. हालाँकि इस मामले में समाजवादी पार्टी नंबर वन है लेकिन यहाँ मैं भाजपा दावों और हक़ीक़त का अंतर बता रहा हूँ. जो पार्टी सिर्फ एक चरण में 50 प्रतिशत से ज़्यादा अपराधियों को टिकट दे रही है उसके नेताओं को दूरबीन से भी अपराधी नज़र नहीं आते. अब या तो वह बंद आँखों से दूरबीन देख रहा है या फिर वह वोटर को बेवक़ूफ़ समझता है और सफ़ेद झूठ बोलकर गुमराह कर रहा है।
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इस मुद्दे पर मैंने यहाँ पर नाम सिर्फ भाजपा और सपा का ही लिया क्योंकि इस चुनाव में मुख्य मुकाबला इन्ही दोनों के बीच है और इस मुद्दे का सीधा सम्बन्ध इन्हीं दोनों पार्टियों से है. यह ऐसा मुद्दा है जिसे सत्ताधारी पार्टी ने मुख्य विपक्षी के लिए अपना मुख्य हथियार बनाया है और समाजवादी पार्टी इसका जवाब प्रभावी ढंग से दे रही है. बाक़ी पार्टियां इस बहस में नहीं हैं हालाँकि बसपा के सुशासन की बात लोग करते रहे हैं।
वैसे भला हो निर्वाचन आयोग का जिसने अपने गर्तकाल में एक अच्छा निर्णय लिया और प्रत्याशियों के आपराधिक आंकड़ों को सार्वजानिक करने की शर्त लगाकर एक हलकी सी प्रत्याशा जगा दी. कम से कम अब आधिकारिक रूप से पता तो चला कि कौन कितना बड़ा अपराधी है. अब एक ही जगह पर अपने भविष्य के कर्णधारों का भूतकाल हमें पता चल रहा है, अब जागरूक वोटर के पास कम से कम इतनी तो जानकारी मिल ही रही है कि उन्हें अमृतकाल में ले जाने के लिए कौन सबसे योग्य है चुनने में आसानी होगी।
ऐसा नहीं है कि अपराधियों से गठजोड़ सिर्फ सपा और भाजपा का है, इस मामले में कोई भी पार्टी साफ़ सुथरी नहीं है. दरअसल राजनीति अब अपराधियों का ऐसा मॉडर्न क्लब बनती जा रही है जिसके सदस्यों की संख्या में चुनाव दर चुनाव इज़ाफ़ा हो रहा है. अब तो अपराधमुक्त राजनीति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। ऐसे सफेदपोशों से अब कोई भी पार्टी बची नहीं है. इस हम्माम में सभी नंगे हैं. तो शाह जी, योगी जी अपने आपको साफ़ सुथरा कहने का ढोंग बंद कीजिये। हो सकता है आपके कपड़ों पर दूसरों के कपड़ों से दाग़ कुछ कम हों मगर आंकड़े जो कह रहे हैं उससे फ़र्क़ बेहद मामूली ही है और आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते।

