फिल्मों से भावनाएं आहत होने के लिए Censor Board ज़िम्मेदार क्यों नहीं?

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आज के ज़माने में बनने वाली पीरियड फिल्में लगातार विवादित बनती रही हैं, शायद ही कोई फिल्म ऐसी हो जिसमें धार्मिक भावनाएं न आहत होती हों. इन फिल्मों के कभी बहिष्कार की घोषणा की जाती है तो कभी फिल्म मेकर और एक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जाती है. यह जानते हुए भी कि यह फ़िल्म सेंसर बोर्ड की क्लीयरेंस लेकर ही रिलीज़ हुई है फिर क्यों उसके खिलाफ समाज का कोई तबका खड़ा हो जाता है। यह तबका सेंसर बोर्ड के खिलाफ यानि सरकार के खिलाफ क्यों नहीं खड़ा होता। क्या सेंसर बोर्ड वालों को इतनी भी समझ नहीं है कि किस फिल्म से धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं. सेंसर बोर्ड वैसे तो अपनी कैंची चलाने के लिए कुख्यात है लेकिन ऐसी फिल्मों पर उसकी समझ कहाँ चली जाती है. एकबार सेंसर बोर्ड से कोई फिल्म पास होकर निकल आये तो फिर यह सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि उस फिल्म या उस फिल्म के निर्माता निर्देशक या एक्टर के खिलाफ किसी तरह की बॉयकॉट कॉल या मुकदमा न हो.

यह अपने आप में अजीब लगता है कि सेंसर बोर्ड से पास हुई फिल्म के खिलाफ कोई पुलिस के पास पहुँचता है और केस दर्ज हो जाता है. अगर केस दर्ज ही होना है तो सबसे पहले सेंसर बोर्ड पर होना चाहिए कि उसकी इतनी गहरी स्क्रीनिंग के बाद भी फिल्म के खिलाफ केस क्यों दर्ज हुआ? हाँ अगर सेंसर बोर्ड ने जो फिल्म पास की है और उससे अलग दृश्य फिल्म में डाले गए हैं तो फिर बात अलग है.

दरअसल भावनाओं के आहत होने और बहिष्कार के एलान के इस दौर में फिल्म “आदिपुरुष” निशाने पर है. खबर है कि जौनपुर में किसी वकील की शिकायत पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने निर्माता ओम राउत, प्रभास, सैफ अली खान समेत पांच लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज की है. सुनवाई की तारीख 27 अक्टूबर रखी गयी है. कहा जा रहा है कि फिल्म के ट्रेलर में राम, सीता, हनुमान और रावण के अशोभनीय चित्रण से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है. अजीब बात है कि भावनाओं के ठेस पहुँचाने के लिए फिल्म के सभी लोग ज़िम्मेदार हो सकते हैं लेकिन सेंसर बोर्ड नहीं।

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