अमित बिश्नोई
मोदी की गारंटियों की चर्चा के बीच आज सुबह एक ऐसी खबर आयी जो केंद्र की भाजपा यानि मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हो सकती, कह सकते हैं कि लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले देश की शीर्ष अदालत ने सरकार के साथ खेला कर दिया, ये खबर ऐसी है कि जब सारी जानकारी सामने आएगी तो बड़े बड़े बेनकाब हो जायेंगे। खबर ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बांड यानि चुनावी चंदे को असंवैधानिक बताते हुए उसपर रोक लगा दी है और कहा है है कि इसके ज़रिये काले धन को सफ़ेद किया जा रहा है. इलेक्टोरल बांड यानि भाजपा की आय का मुख्य स्त्रोत, जिसने भाजपा को पिछले 6 सात सालों में न सिर्फ दुनिया की सबसे अमीर पार्टी बना दिया बल्कि कांग्रेस समेत देश की दूसरी पार्टियों को लगातार गरीब भी बना दिया।
दिलचस्प बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने ये फैसला सुनाया है और ये फैसला सर्वसम्मत से आया है, यानि सरकार के पक्ष में एक भी माननीय जज ने अपनी राय नहीं दी है, देखा जाय तो ये भी अपने आप में हैरानी की ही बात है क्योंकि आजकल तो सुप्रीम पर भी सवाल उठे रहे हैं. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कई कठोर टिप्पणियां भी की हैं जो यकीनन मोदी सरकार को विचलित करेंगी। पहले आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट को ये फैसला सुनाना क्यों पड़ा. दरअसल चुनावी चंदे विशेषकर इलेक्टोरल बांड को लेकर Association for Democratic Reforms यानि ADR और सीपीआई-एम् ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें मांग की गयी थी कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चुनावी चंदे को सार्वजानिक करना अनिवार्य बनाया जाय। इसकी वजह ये थी कि पिछले कुछ सालों में विशेषकर 2017 के बाद से चुनावी चंदे का स्वरुप ही बदल गया था और लगभग सारा चंदा एक ही तरफ जा रहा था, कहना नहीं होगा कि 90 प्रतिशत चंदा भाजपा को जा रहा था. ADR की पिछली रिपोर्ट को देखें तो पिछले साल भाजपा को जहाँ 800 करोड़ रूपये का चुनावी चंदा मिला वहीँ देश की सबसे पुरानी पार्टी यानि कांग्रेस को सिर्फ 80 करोड़ का चंदा मिला, यानि दोनों पार्टियों के बीच 10 गुने का अंतर और उसपर सितम ये कि कोई जान नहीं सकता कि भाजपा को ये चंदा कहाँ से आ रहा है.
इलेक्टोरल बांड कोई भी जाकर SBI से खरीद सकता है जिसकी जानकारी सरकार के पास है, आयकर विभाग के पास है और SBI के पास है. जनता यानि वोटर को ये जानने का कोई हक़ नहीं कि कि वो जिस पार्टी को अपना वोट देता है, चुनाव लड़ने के लिए उसके पास पैसा कहाँ से और किन लोगों से आता है। शीर्ष अदालत ने आज यही बात कही कि चंदे को छुपाना गलत है, जनता के अधिकारों का उल्लंघन है, सूचना के अधिकार की खिलाफवर्जी है. आप इस बात को कैसे छुपा सकते हैं कि राजनीतिक पार्टी को कौन पैसे दे रहा है, किस लिए दे रहा है, क्या इसके पीछे उसका कोई व्यक्तिगत लाभ लेने की मंशा है. जनता को ये जानने का हक़ है, आप उसे इस हक़ से वंचित नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आज बहुत से लोगों में घबराहट बढ़ गयी होगी. शीर्ष अदालत ने SBI से सारी जानकारी मांग ली है. इलेक्टोरल बांड खरीदने वालों का एक एक ब्यौरा तलब कर लिया है और ये सारा ब्यौरा पब्लिक डोमेन में भी आएगा और लोकसभा चुनाव से पहले ही आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को डाइरेक्टिव दे दिए हैं कि वेबसाइट पर सारा ब्यौरा डाला जाय. बचने की गुंजाईश अब ख़त्म ही समझिये। सबका कच्चा चिटठा सामने आएगा। आगे ये भी पता चलेगा कि किसी एक पार्टी को चंदा देने के पीछे उसका उद्देश्य क्या है, क्या चंदा देने के बाद उसके खिलाफ ED या आयकर की चल रही जांच रुक गयी या फिर इलेक्टोरल बांड खरीदने के बाद उसे सरकारी ठेके मिल गए। मतलब बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी। इसे एक शुरुआत भी कह सकते हैं. देखना ये होगा कि शीर्ष अदालत के इस कदम की आंच आगे कहीं PM care फण्ड तक न पहुँच जाए क्योंकि उसकी भी जानकारी जनता से छुपाई गयी है जबकि वो फण्ड जनता की परेशानियों यानि कोरोना की परेशानियों से निपटने के लिए बनाया गया था. कोरोना तो चला गया लेकिन फण्ड अभी कायम है और ये राज़ अभी बना हुआ है कि इस फण्ड में कितना पैसा है, किसका पैसा है. फिलहाल चुनावी महीनों में सुप्रीम का इलेक्टोरल बांड पर रोक लगाना मोदी जी या कहिये भाजपा को बिलकुल पसंद नहीं आया होगा और न ही उन लोगों को पसंद आया होगा जो इलेक्टोरल बांड के बहाने भाजपा की आर्थिक मदद करते हैं। किसी राजनीतिक पार्टी को चुनावी चंदा देना कानूनन गलत नहीं है लेकिन चंदे के बहाने काले को सफ़ेद बनाना जरूर गलत कहा जायेगा और सबसे बड़ी बात लोकतान्त्रिक देश जहाँ जनता ही जनार्दन होती है उसे राजनीतिक पार्टी के बारे में, उस पार्टी के नेताओं के बारे में और उसे मिलने वाले चुनावी चंदे के बारे में जानने का पूरा अधिकार है.

